कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) प्रतिविहितदुर्गो वा मूले दायादं कृत्वा प्रतिलोमामस्य दिशं गच्छेत्–यतो वा मित्रैर्बन्धुभिराटविकैर्वा संसृज्येत, परस्यामित्रैर्दूष्यैर्वा महद्भिः; यतो वा गतोऽस्य मित्रैर्वियोगं कुर्यात्, पाष्णिं वा गृह्णीयात्, राज्यं वास्य हारयेत्, वीवधासारप्रसारान् वा वारयेत्; यतो वा शक्नुयाद् आक्षिकवदपक्षेपेणास्य प्रहर्तुं; यतो वा स्वं राज्यं त्रायेत, मूलस्योपचयं वा कुर्यात्। यतः सन्धिमभिप्रेतं लभते, ततो वा गच्छेत्। (२) सहप्रस्थायिनो वास्य प्रेषयेयुः–‘अयं ते शत्रुरस्माकं हस्तगतः; पण्यं विप्रकारं वापदिश्य हिरण्यमन्तस्सारबलं प्रेषयस्व, एनमर्पयेम बद्धं प्रवासितं वा' इति। प्रतिपन्ने हिरण्यं सारबलं चाददीत। (३) अन्तपालो वा दुर्गसम्प्रदानेन बलैकदेशमतिनीय विश्वस्तं घातयेत्।
सुरंग खुदवा देनी चाहिए अथवा उसको बीच ही में तोड़ कर उसमें विषैला धुआँ या पानी भर देना चाहिए।
(१) अथवा पूरी शक्ति लगा देने पर भी यदि दुर्ग की रक्षा असम्भव जान पड़े तो दुर्बल राजा को चाहिए कि राजधानी में अपने पुत्र को नियुक्त करके वह शत्रु की ऐसी प्रतिकूल दिशा में चला जाय, जहाँ से वह शत्रु का अपकार कर सके; अथवा जिस दिशा में जाकर वह अपने मित्रों, बन्धु-बांधवों और आटविकों की सहायता लेकर शत्रु की हानि कर सके, अथवा शत्रु के शत्रु और अत्यन्त बलवान् उसके दूष्य पुरुषों से मिलकर शत्रु का नुकसान कर सके; अथवा जहाँ जाकर शत्रु के मित्रों को उससे अलग करवा सके; अथवा शत्रु पर पीछे से आक्रमण कर सके; अथवा शत्रु के राज्य का अपहरण कर सके; अथवा जहाँ जाकर शत्रु के वीवध, आसार और प्रसार को शत्रु के पास तक न पहुँचने दे; अथवा जिस दिशा से वह जुआरी की तरह कपट प्रयोगों के द्वारा शत्रु पर प्रहार कर सके; अथवा जहाँ जाकर वह अपने राज्य की सुरक्षा का प्रबन्ध कर सके; अथवा अपनी राजधानी को समृद्ध बना सके; अथवा जहाँ से उसको इच्छानुसार सन्धि करने का अवसर मिल सके, उस दिशा में चला जाय।
(२) अथवा दुर्बल राजा के साथ-साथ जाने वाले गुप्तचर शत्रु के पास इस प्रकार का संदेश भेजें: 'यह तुम्हारा शत्रु इस समय हमारे कब्जे में है, इसलिए तुम किसी सौदे के बहाने धन भेजकर और किसी अपकार के बहाने अन्तःसार सेना को हमारे पास भेज दो। उसके बाद कैद किये या मारे गये इस शत्रु को हम तुम्हारे हवाले कर देंगे।' जब शत्रु राजा इस बात पर राजी होकर धन और सेना भेज दें तो दुर्बल राजा उसको अपने अधीन कर ले।
(३) अथवा अन्तपाल को चाहिए कि वह अपना दुर्ग शत्रु के सुपुर्द करके उसकी