कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 771, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० १६३ : अ० २ ] मन्त्रयुद्ध ६८७
(१) समाहर्तृपुरुषांस्तु ग्राममध्येषु रात्रौ तीक्ष्णा हत्वा ब्रूयुः—'एवं क्रियन्ते, ये जनपदमधर्मेण बाधन्ते' इति । (२) समुत्पन्ने दोषे शून्यपालं समाहर्त्तारं वा प्रकृतिकोपेन घातयेयुः । तत्कुलीनमवरुद्धं वा प्रतिपादयेयुः । (३) अन्तःपुरपुरद्वारद्रव्यधान्यपरिग्रहान् । दहेयुस्तांश्च हन्युर्वा ब्रूयुरस्यार्तवादिनः ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे मन्त्रयुद्धं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितः षट्त्रिंशदधिकशततमः ।
—: ० :—
( १ ) समाहर्त्ता के आदमियों को रात के समय गाँव के मध्य में मारकर तीक्ष्ण गुप्तचर यह प्रचार करें कि 'जो लोग अधर्मपूर्वक प्रजावर्ग को पीड़ित करते हैं उनकी यही दशा होती है ।'
( २ ) जब शून्यपाल और समाहर्ता, दोनों के ऐसे कुकर्म सर्वत्र फैल जायें और उनसे प्रजाजन पूरी तरह कुपित हो जायें, तब सभी गुप्तचर उनका भी वध कर डालें और उस शत्रु राजा के किसी बन्धु-बांधव को या नजरबन्द राजकुमार को सिंहासन पर बैठा दें ।
( ३ ) उसके बाद तीक्ष्ण गुप्तचर अंतःपुर, पुरद्वार ( नगर का प्रधान द्वार ), द्रव्य परिग्रह ( लकड़ी-वस्त्र के गोदाम ) और धान्य परिग्रह ( अन्नभंडार ) आदि को जला दें तथा उन स्थानों के रक्षकों को मार डालें। तदनन्तर स्वयं इस दुर्घटना के लिए हार्दिक दुःख प्रकट करते हुए, इस कार्य को नगर या गाँव के लोगों का किया हुआ बतायें ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में मन्त्रयुद्ध नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—