भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

वाक्य-भाष्य

च कृषिसेवादि लक्षणा तत्रानन्तर- | कालान्तरफला हैं । उनमें जो जो फला फलापवर्गिण्येव कालान्तर- | अनन्तरफला हैं वे फलोदयके समय फला तूत्पन्नप्रध्वंसिनी । | ही नष्ट हो जाती हैं तथा कालान्तर- | फला उत्पन्न होकर [फल देनेसे पूर्व आत्मसेव्याद्यधीनं हि कृषि- | ही] नष्ट हो जानेवाली हैं । सेवादेः फलम् यतः । न चोभय- | क्योंकि कृषिका फल अपने अधीन न्यायव्यतिरेकेण स्वतन्त्रं कर्म | है और सेवा आदिका फल अपने ततो वा फलं दृष्टम् । तथा च | सेव्यके अधीन है । इस दो प्रकारके कर्मफलप्राप्तौ न दृष्टन्यायहान- | न्यायको छोड़कर कर्म या उससे प्राप्त मुपपद्यते । तस्माच्छान्ते यागादि- | होनेवाला फल स्वतन्त्र देखा भी नहीं कर्मणि नित्यः कर्तृकर्मफल- | जाता; तथा कर्मफलकी प्राप्तिमें इस विभागज्ञ ईश्वरः सेव्यादिवद्या- | स्पष्ट दीखनेवाले न्यायको छोड़ना गाद्यनुरूपफलदातोपपद्यते । स | उचित भी नहीं है, इसलिये यागादि चात्मभूतः सर्वस्य सर्वक्रिया- | कर्मोंके समाप्त हो जानेपर उन यागादि- फलप्रत्ययसाक्षी नित्यविज्ञान- | के अनुरूप फल देनेवाला तथा कर्त्ता, स्वभावः संसारधर्मैरसंस्पृष्टः । | कर्म और फलके विभागको जाननेवाला श्रुतेश्च । “न लिप्यते लोक- | ईश्वर सेव्य आदिके समान होना ही दुःखेन बाह्यः” | चाहिये, और वह सबका अन्तरात्मा, (ईश्वरास्तित्व-साधनम्) (क० उ० २।२।११) | सम्पूर्ण कर्मफल और प्रतीतियोंका “जरां मृत्युमत्येति” | साक्षी, नित्यविज्ञानस्वरूप तथा (बृ० उ० ३।५।१) “विजरो | सांसारिक धर्मोंसे अछूता होना चाहिये । विमृत्युः” । (छा० उ० | यही बात श्रुतिसे भी सिद्ध होती ८।७।१) “सत्यकामः सत्य- | है। “सम्पूर्ण लोकोंसे विलक्षण परमात्मा सङ्कल्पः (छा० उ० ८।७।१) | लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता” “एष सर्वेश्वरः” (मा० उ० ६) | “वह जरा और मृत्युको पार किये हुए “साधु कर्म कारयति” (कौषी० | है” “जरा और मृत्युसे रहित है” “वह उ० ३।९) “अनश्नन्नन्यो अभि- | सत्यकाम सत्यसङ्कल्प है” “यह सर्वेश्वर | है” “वह शुभ कर्म कराता है” “दूसरा | [पक्षी] कर्मफलको न भोगता हुआ