भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

वाक्य-भाष्य निरपेक्षं केवलेन कर्त्रैव प्रयुक्तं | किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करके केवल कर्तासे ही प्रेरित होकर फल फलदं दृष्टम् । न विनष्टोऽपि | देते देखा भी नहीं है । सर्वथा नष्ट हुआ याग कालान्तरमें फल देनेवाला यागः कालान्तरे फलदो भवति । | कभी नहीं होता । सेव्यबुद्धिवत्सेवकेन सर्वज्ञे- | जिस प्रकार सेवककी सेवासे सेव्य (स्वामी) की बुद्धिपर संस्कार पड़ . [कर्मफलप्रदाने] श्वरबुद्धौ तु संस्कृ- | जाता है उसी प्रकार यागादि कर्मसे सर्वज्ञ ईश्वरकी बुद्धिके संस्कारयुक्त [ईश्वरस्य] तायां यागादि- | हो जानेसे, फिर उस कर्मके नष्ट हो जानेपर भी, जैसे सेवकको स्वामीसे [प्राधान्यम्] कर्मणा विनष्टेऽपि | वैसे ही कर्ताको ईश्वरसे फल मिल जाता है—ऐसा विचार ही ठीक है । कर्मणि सेव्यादिव | पदार्थ तो, सैकड़ों प्रमाणभूत वाक्य होनेपर भी, देशान्तर या कालान्तरमें ईश्वरात्फलं कर्तुर्भवतीति युक्तम् । | अपने स्वभावको नहीं छोड़ते । अग्नि किसी भी देश या कालान्तरमें शीतल न तु पुनः पदार्था वाक्यशतेनापि | नहीं हो सकता । इस प्रकार कर्मोंका भी कालान्तरमें दो ही प्रकार फल देशान्तरे कालान्तरे वा स्वं स्वं | मिलता देखा जाता है । स्वभावं जहति । न हि देश- | कृषि आदि कर्म ऐसे कर्ताकी अपेक्षासे फल देनेवाले हैं जिसे बीज, कालान्तरेषु चाग्निरनुष्णो भवति। | क्षेत्रसंस्कार तथा खेतीकी रक्षा आदिका ज्ञान हो, और सेवा आदि कर्म एवं कर्मणोऽपि कालान्तरे फलं | विज्ञानवान् सेव्यकी बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे फलदायक हैं । यागादि द्विप्रकारमेवोपलभ्यते । | कर्म कालान्तरमें फल देनेवाले हैं इसलिये उनकी फलप्राप्तिको अज्ञानी बीजक्षेत्रसंस्कारपरिरक्षावि- | कर्ताकी अपेक्षासे मानना तो ठीक नहीं है; अतः उनका फल कर्म, देश, ज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलं कृष्यादि वि- | काल, निमित्त और कर्मविपाकके विभागको जाननेवाले किसी चेतनकी ज्ञानवत्सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलं | बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे ही हो च सेवादि । यागादेः कर्मणस्त- | थाविज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलत्वानुप- | पत्तौ कालान्तरफलत्वात्कर्मदेश- | कालनिमित्तविपाकविभागज्ञबुद्धि- | संस्कारापेक्षं फलं भवितु- |