केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
पद-भाष्य पराजयहेतुः; तत्कथं नास्तीत्येत- | तब वह है किस प्रकार नहीं ? स्वार्थस्यानुकूलानि ह्युत्तराणि | [ अर्थात् अवश्य ही है ] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके वचांसि दृश्यन्ते । | वाक्य देखे जाते हैं । वाक्य-भाष्य अस्ति तत्र भेदो दृष्टः; यथाश्व- | ही देखा गया है; जैसे घोड़े और महिषयोः । तथा ज्ञानादिलक्षण- | भैंसमें । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि भेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति | लक्षणोंमें भेद रहनेके कारण ईश्वर और चेत् । | जीवोंमें भेद ही है । न । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है । कस्मात् ? | पूर्व०—कैसे ? "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति | सिद्धान्ती—क्योंकि "यह (ब्रह्म) न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) | अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो "ते क्षय्यलोका भवन्ति" (छा० | जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूप- उ० ७।२५।२) "मृत्योः स | को] नहीं जानता" "वे नाशवान् मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) | लोकोंको प्राप्त होते हैं" "वह मृत्युसे इति भेददृष्टिर्ह्यपोद्यते । एकत्व- | मृत्युको प्राप्त होता है" इत्यादि प्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशा | वाक्योंसे भेददृष्टिका निषेध किया जाता विद्यन्ते । | है और एकत्वका प्रतिपादन करने- | वाली तो सहस्रों श्रुतियाँ विद्यमान हैं। यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादि- | तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि त्यत्रोच्यते—न | लक्षणोंमें भेद होनेके कारण जीव और ज्ञानादिभेदस्य औपाधिकत्वम् | ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमें अनभ्युपगमात् । | मेरा यह कथन है कि उनमें कुछ भी बुद्ध्यादिभ्यो व्यति- | भेद नहीं है, क्योंकि हमें उनके ज्ञानादि- रिक्ता विलक्षणाश्चेश्वराद्भिन्न- | का भेद मान्य नहीं है। बुद्धि आदि लक्षणा आत्मानो न सन्ति। एक | उपाधियोंसे व्यतिरिक्त और विलक्षण एवेश्वरश्चात्मा सर्वभूतानां | ऐसे कोई जीव नहीं हैं जो ईश्वरसे | भिन्न लक्षणवाले हों। एक ही नित्यमुक्त | ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा माना