भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 152 में से

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पृष्ठ 108

१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३ पद-भाष्य अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये । | अथवा इस ( आख्यायिका ) कथम् ? ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्या- | का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः । | लिये है । किस प्रकार ? क्योंकि ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति । | ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण | देवताओंमें श्रेष्ठत्वको प्राप्त हुए थे और | उनमें भी इन्द्र सबसे बढ़कर हुआ । वाक्य-भाष्य नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्य- | जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि श्चक्षुर्बुद्ध्यादिसमाहारसन्तानाहं- | आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए कारममत्वादि विपरीतप्रत्ययप्र- | अहंकार और ममतारूप विपरीत बन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्ध- | ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका बुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्य- | लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त विज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजि- | विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका स्वभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान | अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते; | अवभास ( प्रतिबिम्ब ) चित्त, चैत्य यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारः | ( सुखादि विषय ), बीज (अविद्यादि) विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः । | और बीजी ( शरीरादि ) से तादात्म्यको | प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो | कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और | ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य | जीव माना गया है; जिसके इस | औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे | संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद | हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है । अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्र- | इसमें जो देव, पितृ और मनुष्यरूप ध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो | भूतोंका संघातविशेष है वह मृत्तिकाके भूतविशेषसमाहारो न पुनश्चतु- | लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला र्थोऽन्यो भिन्नलक्षण ईश्वरादभ्यु- | और [ चेतन आत्मासे ] सर्वथा भिन्न पगम्यते । | है; किन्तु जो [ स्थूल, सूक्ष्म और | कारण तीनों प्रकारके शरीरोंसे ] | विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे | भिन्न लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता ।