भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

१०४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

देवताओंका गर्व ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥ १ ॥ यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्मने देवताओंके लिये विजय प्राप्त की। कहते हैं, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥ पद-भाष्य ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं ह किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लब्धवत् देवानामसुरार्णा च | यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोंवाले परब्रह्मने देवताओंके लिये जय प्राप्त की। अर्थात् देवता और असुरोंके संग्राममें संसारके वाक्य-भाष्य तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् एकत्वम् । | है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी सिद्धि नहीं होती। अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है। तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- | अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, [बन्धमोक्ष-व्यवस्था] विषयवेदनासन्तानस्य अहङ्कारसम्बन्धादज्ञान-बीजस्य नित्यविज्ञाना-न्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यवि-ज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानबीजस्य वि-च्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा; विपर्यये च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वा-दुभयोः । | विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहका, जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्म-तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे उस निमित्तके निवृत्त हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका उच्छेद हो जाना है वही आत्माका मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीत-का नाम बन्ध है, क्योंकि वे [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही [बुद्ध्यादि उपाधिविशिष्ट] स्वरूपकी अपेक्षासे हैं। ब्रह्म ह इत्यैतिहासार्थः । पुरा किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थिति-परिपिपालयिष्यात्मानुशासनानु-वर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय | 'ब्रह्म ह' इसमें 'ह' ऐतिह्य (इतिहास) का द्योतक है। कहते हैं, पूर्वकालमें देवासुरसंग्राममें ब्रह्मने जगत्-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षाके लिये अपनी आज्ञामें चलनेवाले विजयार्थी देवताओंके लिये असुरोंको