भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦

पद-भाष्य तदा आत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन | तत्र, अन्तःकरणमें स्थित, ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफल- | प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियोंके | सम्पूर्ण कर्मफलोंका संयोग कराने- संयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः | वाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत्‌की जगतः स्थितिं चिकीर्षोः अयं | रक्षा करनेके इच्छुक ईश्वरकी ही | यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह जयो महिमा चेत्यजानन्तः ते देवाः | न जानते हुए आत्माको अग्नि ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि | आदि रूपोंसे परिच्छिन्न माननेवाले स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽस्माक- | देवता सोचने लगे कि--हमलोगों- | की ही यह विजय हुई है, और इस मेवाय विजयः अस्माकमेवायं | विजयकी फलभूत अग्नित्व, वायुत्व महिमा अग्निर्वाय्विन्द्रत्वादि- | एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी | हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही लक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनु- | इसका अनुभव किया जाता है; यह भूयते; नास्मत्प्रत्यगात्मभूतेश्वर- | विजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्म- | भूत ईश्वरकी की हुई नहीं है। कृत इति । एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां | इस प्रकार मिथ्या अभिमानसे | विचार करनेवाले उन देवताओंके तत् ह किल एषां मिथ्येक्षणं | इस मिथ्या विचारको ब्रह्मने जान विजज्ञौ विज्ञातवद्ब्रह्म । सर्वेशितृ | लिया, क्योंकि समस्त जीवोंके

वाक्य-भाष्य ईश्वरनिमित्ते विजये स्वसाम- | जो विजय ईश्वरके निमित्तसे प्राप्त | हुई थी उसमें 'यह हमारी सामर्थ्यसे र्थ्यनिमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽ- | प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी

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