केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें४ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य सकामस्य तु ज्ञानरहितस्य केव- | ज्ञानरहित सकाम साधकके केवल लानि श्रौतानि स्मार्तानि च | श्रौत और स्मार्त कर्म दक्षिण कर्माणि दक्षिणमार्गप्रतिपत्तये | मार्गकी प्राप्ति और पुनरावर्तनके पुनरावृत्तये च भवन्ति । स्वाभा- | हेतु होते हैं । इनके सिवा विक्या त्वशास्त्रीयया प्रवृत्त्या | अशास्त्रीय स्वच्छन्द वृत्तिसे तो पशु- पश्चादिस्थावरान्ता अधोगतिः | से लेकर स्थावरपर्यन्त अधोगति ही स्यात् । “अथैतयोः पथोर्न कतरेण | होती है । “ये [ स्वच्छन्द प्रवृत्ति- च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा- | वाले जीव उत्तरायण और वर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व | दक्षिणायन ] इन दोनोंमेंसे किसी म्रियस्वेत्येतत्तृतीयँ स्थानम्” | मार्गसे नहीं जाते; वे निरन्तर (छा० उ० ५।१०।८) इतिश्रुतेः; | आवर्तन करनेवाले क्षुद्र जीव होते | हैं; उनका ‘जन्म लो और मरो’ | यह तीसरा स्थान (मार्ग) है” वाक्य-भाष्य कस्मादिति चेदात्मनो हि यथा- | कि क्यों ? तो उसका कारण यह है कि वद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । | आत्माका यथार्थ ज्ञान कर्मका विरोधी निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा | है, क्योंकि जिसका ज्ञान कराना अभीष्ट विजिज्ञापयिषितः, “तदेव ब्रह्म | है वह आत्मा तो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप त्वं विद्धि नेदं यदिदम् ०” | ही है, जैसा कि “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि (के० उ० १।४) इत्यादि श्रुतेः । | नेदं यदिदमुपासते” इत्यादि श्रुतिका न हि स्वराज्येऽभिषिक्तो ब्रह्मत्वं | कथन है । जो पुरुष स्वाराज्यपर गमितः कश्चन नमितुमिच्छत्यतो | अभिषिक्त होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो ब्रह्मास्मीति सम्बुद्धो न कर्म | गया है वह किसीके भी सामने झुकने- कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् | की इच्छा नहीं करता । अतः जिसने अवाप्तार्थं ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्तिं | यह जान लिया है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ प्रयोजनवतीं पश्यति । न च | उससे कर्म नहीं कराया जा सकता । | अपने आत्माको आप्तकाम ब्रह्म मानने- | वाला पुरुष किसी भी प्रवृत्तिको | प्रयोजनवती नहीं देखता और कोई भी