भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५

पद-भाष्य “प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः” | इस श्रुतिसे और “तीन प्रसिद्ध (ऐ० आ० २।१।१।४) इति च | प्रजाओंने धर्मत्याग किया" इस मन्त्रवर्णात् । | मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ] । विशुद्धसत्त्वस्य तु निष्कामस्य | जो इस जन्म और पूर्व जन्ममें ज्ञानाधिकारि- एव बाह्यादनित्यात् | किये हुए कर्मोंके संस्कारविशेषसे निरूपणम् साध्यसाधनसम्बन्धाद् | उद्भूत बाह्य एवं अनित्य साध्य- इह कृतात्पूर्वकृताद्वा संस्कार- | साधनके सम्बन्धसे विरक्त हो गया विशेषोद्भावाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | है उस विशुद्धचित्त निष्काम पुरुष- विषया जिज्ञासा प्रवर्तते । | को ही प्रत्यगात्मविषयक जिज्ञासा हो सकती है । यही बात तदेतद्वस्तु प्रश्नप्रतिवचनलक्षण्या | 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्नोत्तररूपा वाक्य-भाष्य निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतो विरुध्यत | प्रवृत्ति बिना प्रयोजनके हो नहीं एव कर्मणा ज्ञानम् । अतः कर्म- | सकती, अतः कर्मसे ज्ञानका विरोध विषयेऽनुक्तिः,विज्ञानविशेषविषया | है ही। इसीलिये कर्मकाण्डमें आत्म- एव जिज्ञासा । | ज्ञानका उल्लेख नहीं है; अर्थात् जिज्ञासा किसी विज्ञानविशेषके सम्बन्धमें ही होती है। कर्मानारम्भ इति चेन्न; | यदि कहो कि तब तो कर्मका निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात् । | आरम्भ ही न किया जाय तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि निष्काम कर्म पुरुषका संस्कार करनेवाला है । यदि ह्यात्मविज्ञानेनात्माविद्या- | पूर्व०-यदि आत्माके अज्ञानका विषयत्वात्परितित्याजायिषितं कर्म | कारण होनेसे आत्मज्ञानद्वारा कर्मका परित्याग कराना ही अभीष्ट है तो ततः "प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूराद- | "कीचड़को धोनेकी अपेक्षा तो उसे स्पर्शनं वरम्” (म० वन०२।४९) | दूरसे न छूना ही अच्छा है" इस