भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 14

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६ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ केनोपनिषद् $\qquad\qquad\qquad\qquad$ [ खण्ड १

पद-भाष्य

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
श्रुत्या प्रदर्श्यते 'केनेषितम्'श्रुतिद्वारा दिखलायी जाती है।
इत्याद्यया । काठके चोक्तम्कठोपनिषद्‌में तो कहा है—
“पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू-“स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको
स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्त-बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया
रात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मा-है; इसलिये इन्द्रियाँ बाहरकी ओर
नमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्”ही देखती हैं, अन्तरात्माको नहीं
(क०उ० २।१।१) इत्यादि ।देखतीं; किसी-किसी बुद्धिमान्‌ने
“परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणोही अमरत्वकी इच्छा करते हुए
अपनी इन्द्रियोंको रोककर
प्रत्यगात्माका साक्षात्कार किया है”
इत्यादि । तथा अथर्ववेदीय (मुण्डक)
उपनिषद्‌में भी कहा है—“ब्रह्मनिष्ठ
पुरुष कर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले

वाक्य-भाष्य

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
इत्यनारम्भ एव कर्मणः श्रेयान् ।उक्तिके अनुसार कर्मको आरम्भ न
अल्पफलत्वादायासबहुलत्वात्करना ही उत्तम है क्योंकि वह अल्प
तत्त्वज्ञानादेव च श्रेयःप्राप्तेःफलवाला और अधिक परिश्रमवाला
इति चेत् ।है तथा आत्यन्तिक कल्याण तत्त्व-
विज्ञानसे ही होता है।

(पार्श्व-टिप्पणी)संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
सत्यम्; एतदविद्याविषयंसिद्धान्ती-ठीक है, परन्तु यह
चित्तशुद्धयेकर्माल्पफलत्वादि-अविद्यामूलक कर्म “जो भोगोंकी
कर्मावश्यकम्दोषवद्बन्धरूपं चकामना करता है” तथा “इस प्रकार
प्राप्तज्ञानस्य तुसकामस्य “कामान्जो कामना करनेवाला है” इत्यादि
तदनारम्भःयः कामयते” (मु०उ०श्रुतियोंके अनुसार सकाम पुरुषके लिये
३।२।२) “इति नु कामयमानः”ही अल्पफलत्वादि दोषोंसे युक्त तथा
इत्यादिश्रुतिभ्यः; न निष्कामस्य ।बन्धनकारक है; निष्काम पुरुषके लिये
तस्य तु संस्कारार्थान्येव कर्माणिनहीं। उसके लिये तो कर्म अपने
निर्वर्तक (निष्पन्न करनेवाले) और
आश्रयभूत प्राणोंके विज्ञानके सहित