केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ चतुर्थ खण्ड उमाका उपदेश सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीय- ध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥ उस विद्यादेवीने स्पष्टतया कहा—'यह ब्रह्म है, तुम ब्रह्मके ही विजयमें इस प्रकार महिमान्वित हुए हो'। कहते हैं, तभीसे इन्द्रने यह जाना कि यह ब्रह्म है ॥ १ ॥ पद-भाष्य सा ब्रह्मेति होवाच ह किल | उसने 'यह ब्रह्म है' ऐसा कहा। ब्रह्मणो वै ईश्वरस्यैव विजये— | 'निस्सन्देह ब्रह्म—ईश्वरके विजयमें ईश्वरेणैव जिता असुराः; यूयं | ही [ तुम महिमाको प्राप्त हुए हो ]। असुरोंको ईश्वरने ही जीता था; तत्र निमित्तमात्रम्; तस्यैव | तुम तो उसमें निमित्तमात्र थे । अतः उसके ही विजयमें तुम्हें विजये—यूयं महीयध्वं महिमानं | यह महिमा मिली है।' मूलमें प्राप्नुथ । एतदिति क्रियाविशेष- | 'एतत्' यह क्रियाविशेषणके लिये वाक्य-भाष्य तां च पृष्ट्वा तस्या एव वचनाद् | इन्द्रने उस उमासे पूछकर उसीके विदाञ्चकार विदितवान् । अत | वचनसे [ ब्रह्मको ] जाना था; अतः इन्द्रस्य बोधहेतुत्वाद्विद्यैवोमा । | इन्द्रके बोधकी हेतुभूता होनेसे उमा विद्यासहायवानीश्वर इति | विद्या ही है। 'ईश्वर विद्यासहायवान् है' ऐसी स्मृति भी है। क्योंकि इन्द्रके स्मृतिः। यस्मादिन्द्रविज्ञानपूर्वकम् | विज्ञानपूर्वक अग्नि वायु और इन्द्र अग्निवाय्विन्द्रास्ते ह्येनन्नेदिष्ठमति- | इन देवताओंने ही ब्रह्मको, उसके