केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ पद-भाष्य तस्मात् स्वैर्गुणैः अतितरामिव | इसलिये निश्चय ही ये देवगण शक्तिगुणादिमहाभाग्यैः अन्यान् | अपने शक्ति एवं गुण आदि महान् देवान् अतितराम् अतिशेरत | सौभाग्योंके कारण अन्य देवताओंसे इव एते देवाः । इव | बढ़कर हुए । 'इव' शब्द निरर्थक शब्दोऽनर्थकोऽवधारणार्थो वा । | अथवा निश्चयार्थबोधक है। क्योंकि यद् अग्निः वायुः इन्द्रः ते हि | अग्नि, वायु और इन्द्र—इन देवा यस्मात् एनत् ब्रह्म नेदिष्ठम् | देवताओंने इस ब्रह्मको पूर्वोक्त अन्तिकतमं प्रियतमं पस्पर्शः | संवाद आदि प्रकारोंसे नेदिष्ठ स्पृष्टवन्तो यथोक्तैर्ब्रह्मणः सं- | अर्थात् अत्यन्त निकटवर्ती एवं वादादिप्रकारैः, ते हि यस्माच्च | प्रियतम भावसे स्पर्श किया था हेतोः एनद् ब्रह्म प्रथमः प्रथमाः | और उन्होंने ही इस ब्रह्मको प्रथम प्रधानाः सन्त इत्येतत्, विदांचकार | अर्थात् प्रधानरूपसे 'यह ब्रह्म है' विदांचकुरित्येतद्ब्रह्मेति ॥२॥ | ऐसा जाना था ॥ २ ॥ यस्मादग्निवायू अपि इन्द्र- | क्योंकि अग्नि और वायुने भी वाक्यादेव विदांचक्रतुः, इन्द्रेण हि | इन्द्रके वाक्यसे ही उसे जाना था, कारण कि उमाके वाक्यसे तो इन्द्रने उमावाक्यात्प्रथमं श्रुतं ब्रह्मेति— | ही पहले सुना था कि 'यह ब्रह्म है'— तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥ इसलिये इन्द्र अन्य सब देवताओंसे बढ़कर हुआ क्योंकि उसने ही इस समीपस्थ ब्रह्मको स्पर्श किया था—उसने ही पहले-पहल 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार इसे जाना था ॥ ३ ॥ वाक्य-भाष्य अन्यान्देवांस्ततोऽपीन्द्रोऽतितरां | उनमें भी इन्द्र सबसे अधिक | दीप्तिमान् है, क्योंकि सबसे पहले उसे दीप्यते। आदौ ब्रह्मविज्ञानात् ॥१-३॥ | ही ब्रह्मका ज्ञान हुआ था ॥ १-३ ॥