भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ पद-भाष्य स्वार्थे णिच् । उपमार्थ एव | यहाँ स्वार्थमें 'णिच्' प्रत्यय हुआ है । आकारः । चक्षुषो विषयं प्रति | 'आ' उपमाके ही लिये है। इस प्रकार प्रकाशतिरोभाव इव चेत्यर्थः । | 'नेत्रके विषयसे प्रकाशके छिप जानेके समान' ऐसा अर्थ हुआ। इस तरह यह इति अधिदैवतं देवताविषयं | ब्रह्मकी अधिदैवत—देवताविषयक ब्रह्मण उपमानदर्शनम् ॥ ४ ॥ | उपमा दिखलायी गयी ॥ ४ ॥ ब्रह्मविषयक अध्यात्म आदेश अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुप- स्मरत्यभीक्ष्णꣳसङ्कल्पः ॥ ५ ॥ इसके अनन्तर अध्यात्मउपासनाका उपदेश कहते हैं—यह मन जो जाता हुआ सा कहा जाता है वह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, क्योंकि इससे ही यह ब्रह्मका स्मरण करता है और निरन्तर संकल्प किया करता है ॥ ५ ॥ पद-भाष्य अथ अनन्तरम् अध्यात्मं | इसके पश्चात् अब अध्यात्म प्रत्यगात्मविषय आदेश उच्यते । | अर्थात् प्रत्यगात्मा-सम्बन्धी आदेश वाक्य-भाष्य अथ अनन्तरमध्यात्ममात्म- | अब आगे अध्यात्म—आत्म- विषयक उपासना कही जाती है— विषयमध्यात्ममुच्यत इति वाक्य- | इस प्रकार इस वाक्यमें 'उच्यते' यह क्रियापद शेष है। जो यह मन उपर्युक्त शेषः । यदेतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म | लक्षणोंवाले ब्रह्मके प्रति मानो जाता— . केनो० ५—