केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ पद-भाष्य शमः । कर्म अग्निहोत्रादि । | हैं। और कर्म अग्निहोत्रादि हैं। एतैर्हि संस्कृतस्य सत्त्वशुद्धिद्वारा | इनके द्वारा संस्कारयुक्त हुए पुरुषों- | को ही चित्तशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानकी तत्त्वज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । दृष्टा ह्यमृ- | उत्पत्ति होती देखी गयी है । जिनका दितकल्मषस्योक्तेऽपि ब्रह्मण्य- | मनोमल निवृत्त नहीं हुआ है .उन | पुरुषोंको तो उपदेश दिया जानेपर प्रतिपत्तिर्विपरीतप्रतिपत्तिश्च, यथे- | भी ब्रह्मके विषयमें अज्ञान अथवा न्द्रविरोचनप्रभृतीनाम् । | विपरीत ज्ञान होता देखा गया है, | जैसे इन्द्र और विरोचन आदिको । तस्मादिह वातीतेषु वा बहुषु | अतः इस जन्ममें अथवा बीते जन्मान्तरेषु तपआदिभिः कृत- | हुए अनेकों जन्मोंमें जिनका चित्त सत्त्वशुद्धेर्ज्ञानं समुत्पद्यते यथा- | तप आदिसे शुद्ध हो गया है उन्हें श्रुतम्; “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा | ही. श्रुत्युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है । देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता | “जिसकी भगवान्में अत्यन्त भक्ति ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः” | है और जैसी भगवान्में है वैसी ही ( श्वे० उ० ६।२३ ) इति मन्त्र- | गुरुमें भी है उस महात्माको ही ये वर्णात् । “ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | पूर्वोक्त विषय प्रकाशित होते हैं” | इस मन्त्रवर्णसे तथा “पापकर्मोंके वाक्य-भाष्य वर्तते । ब्रह्माश्रया हि विद्या । | पदकी अनुवृत्ति की जाती है । क्योंकि सत्यं यथाभूतवचनमपीडाकरम् | विद्या ब्रह्म (वेद) के ही आश्रय रहने- | वाली है । सत्य अर्थात् दूसरेको पीडा आयतनं निवासः सत्यवत्सु हि | न पहुँचानेवाला यथार्थ वचन सर्वं यथोक्तमायतन इवावं- | आयतन—निवासस्थान है,.. क्योंकि | सत्यवान् पुरुषोंमें ही उपर्युक्त साधन स्थितम् ॥ ८ ॥ | आयतनके समान स्थित हैं ॥ ८ ॥