केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य त्वम्, इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनार्थं | प्रकार इस अभिप्रायको प्रदर्शित | करनेके लिये ही 'किसके द्वारा केनेषितं पतति प्रेषितं मन इति | इच्छित और प्रेषित किया हुआ मन | [अपने विषयकी ओर] जाता है' ऐसे विशेषणद्वयमुपपद्यते । | दो विशेषण ठीक हो सकते हैं । ननु स्वतन्त्रं मनः स्वविषये | यदि कहो कि यह बात तो | प्रसिद्ध ही है कि मन स्वतन्त्र है मनःप्रभृतीनां स्वयं पततीति प्रसि- | और वह स्वयं ही अपने विषयोंकी पारतन्त्र्य- द्धम्; तत्र कथं प्रश्न | ओर जाता है; फिर उसके विषयमें प्रदर्शनम् उपपद्यत इति, उच्यते— | यह प्रश्न कैसे बन सकता है ? | तो इसके उत्तरमें हमारा कहना है यदि स्वतन्त्रं मनः प्रवृत्ति- | कि यदि मन प्रवृत्ति-निवृत्तिमें | स्वतन्त्र होता तो सभीको अनिष्ट- निवृत्तिविषये स्यात्, तर्हि सर्वस्य | चिन्तन होना ही नहीं चाहिये था । अनिष्टचिन्तनं न स्यात् । अनर्थं | किन्तु मन जान-बूझकर भी अनर्थ- च जानन्सङ्कल्पयति । अभ्यग्र- | चिन्तन करता है और रोके वाक्य-भाष्य विषयावभासमात्रं करणानां | इन्द्रियोंकी स्वतः प्रवृत्ति तो केवल | विषयोंका प्रकाशनमात्र ही है । मन प्रवृत्तिः । चलिक्रिया तु प्राण- | आदिमें चलन-क्रिया तो प्राण- स्यैव मनआदिषु । तस्मात्प्राथम्यं | हीकी है; इसीलिये प्राणकी प्रधानता प्राणस्य । प्रैति गच्छति युक्तः | है । वह प्राण किससे युक्त अर्थात् | प्रेरित होकर गमन करता यानी प्रयुक्त इत्येतत् । वाचो वदनं किं | चलता है । वाणीका भाषण भी किस निमित्तं प्राणिनां चक्षुःश्रोत्रयोश्च | निमित्तसे होता है ? प्राणियोंके नेत्र | और श्रोत्रोंको प्रेरित करनेवाला कौन को देवः प्रयोक्ता । करणानाम् | देव है ? अर्थात् जो चेतन तत्त्व अधिष्ठाता चेतनावान्यः स किं- | इन्द्रियोंका अधिष्ठाता है वह किन विशेषण इत्यर्थः ॥ १ ॥ | विशेषणोंसे युक्त है ? ॥ १ ॥