भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य नैष दोषः। अयमत्र पदार्थः— समाधान—यह भी कोई दोष श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं नहीं है। यहाँ इस पदका अर्थ दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जन- इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय- सामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्म- को अभिव्यक्त करनेमें समर्थ है— ज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे यह देखा ही जाता है। किन्तु सति भवति, न असति इति । श्रोत्रका वह अपने विषयको अभि- अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याद्युप- व्यक्त करनेका सामर्थ्य नित्य, पद्यते । तथा च श्रुत्यन्तराणि— असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्म- “आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” ज्योतिके रहनेपर ही रह सकता है, न (बृ० उ० ४।३।६) “तस्य भासा रहनेपर नहीं रह सकता। अतः सर्वमिदं विभाति” (क० उ० उसे ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि कहना २।२।१५, श्वे० ६।१४, उचित ही है। “यह अपने ही मु० २।२।१०) “येन सूर्यस्त- प्रकाशसे प्रकाशित है” “उसके पति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३। प्रकाशसे ही यह सब प्रकाशित १२।९।७) इत्यादीनि । होता है” “जिस तेजसे प्रदीप्त हुआ सूर्य तपता है” इत्यादि श्रुतियाँ भी इसी अर्थकी द्योतक हैं। तथा वाक्य-भाष्य अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं आत्मामें ] जिनके संयोगसे अनित्य उपलब्धृत्व है वे श्रोत्रादि करण कहलाते तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव हैं। जलके दाहकत्वके समान आत्मामें दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत्। उपलब्धृत्व अनित्य ही है। जैसे अग्निमें नित्य उष्णता रहनेके कारण यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमग्ना- वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार विवौष्ण्यं स नित्योपलब्धिस्वरूप- जिसमें नित्य-उपलब्धृत्व रहता है वह नित्य उपलब्धिस्वरूप होनेके कारण उप- त्वादग्ध्नेवोपलब्धोच्यते । श्रोत्रा- लब्धा कहा जाता है। श्रोत्रादि निमित्तोंके होनेपर जो आत्मामें श्रोतृत्ववादिकी उप- दिषु श्रोतृत्वानुपलब्धिरनित्या लब्धि होती है वह अनित्य है और केवल नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य आत्मामें वह नित्य है, अतः 'श्रोत्रस्य