केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य ‘न विद्मो न विजानीमो यथै- | [पूर्वोक्त श्रुतिके] ‘न विद्मो | न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’ तदनुशिष्यात्’ इति अत्यन्तम् | इस वाक्यसे उपदेशके प्रकारका एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते | अत्यन्त निषेध प्राप्त होनेपर उसका तदपवादोऽयमुच्यते । सत्यमेवं | यह अपवाद कहा जाता है । यह | ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैर्न परः | परमात्माकी प्रतीति नहीं करायी प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु | जा सकती, किन्तु शास्त्रसे तो | उसकी प्रतीति करायी ही जा शक्यत एव प्रत्याययितुमिति | सकती है—अतः उसके उपदेशके | लिये शास्त्रप्रमाण देते हैं— तदुपदेशार्थमागममाह— वाक्य-भाष्य अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादि- | अथवा शिष्यके यह कहनेपर कि लक्षणं ब्रह्म विशेषेण दर्शयेत्युक्त | ‘श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको विशेष- | रूपसे दिखलाओ’ आचार्य कहते हैं आचार्य आह न शक्यते दर्श- | कि ‘उसे दिखाया नहीं जा सकता।’ | क्यों ? ‘क्योंकि उसतक नेत्र नहीं पहुँच यितुम्। कस्मात् ? न तत्र चक्षु- | सकते’ इत्यादि प्रकारसे सबका आशय र्गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम्। अत्र | पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ | ‘यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्यका तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । | विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेत् | अन्य विधिसे कोई अन्य गुरु अपने | शिष्योंको इसका अनुशासन— अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन | प्रतिपादन कर सकता है [ वह हम विधिनेत्यभिप्रायः । | नहीं जानते ] । सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त | ‘परन्तु मुझे तो किसी भी तरह | ब्रह्मका बोध करा ही दीजिये’— आचार्य आह, अन्यदेव तद्वि- | शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य कहते | हैं—‘वह ब्रह्म जाने हुएसे अन्य है दितादथो अविदितादधीत्या- | तथा बिना जानेसे भी परे है’—जाने | और न जाने हुएसे भिन्न होना यही गमम् विदिताविदिताभ्यामन्य- | उपदेशकी परम्परा है । इसके सिवा