केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य कार्यार्थं हि कारणमन्यदन्येन | किसी कार्यके लिये ही किसी अन्य उपादीयते । अतश्च न वेदितुः | पुरुषद्वारा एक अन्य कारण यानी साधनको ग्रहण किया जाता है; अतः अन्यस्मै प्रयोजनायान्यदुपादेयं | वेत्ता (आत्मा) को किसी अन्य प्रयोजनके लिये कोई अन्य साधन भवतीति । एवं विदिताविदिता- | उपादेय नहीं है । इस प्रकार वह विदित और अविदित दोनोंसे भिन्न भ्यामन्यदिति हेयोपादेय- | है—इस कथनद्वारा हेय और उपादेयका प्रतिषेध कर दिया जाने- प्रतिषेधेन स्वात्मनोऽनन्यत्वाद् | से [ ज्ञेय वस्तु ] अपने आत्मासे अभिन्न सिद्ध होनेके कारण शिष्यकी ब्रह्मविषया जिज्ञासा शिष्यस्य | ब्रह्मविषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती वाक्य-भाष्य अन्तःकरणस्य मनसोऽपि | [ किन्तु वह शुद्ध चेतन तो ] मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । | 'आत्मा सर्वान्तर है' ऐसा बतलाने-वाली श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण | यानी मनका भी मन है। उस अन्तर्गत, आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भ- | नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाशके समान भूतेन बाह्यो बुद्ध्यात्मा तद्विलक्षणः | अविचल और अन्तर्गर्भभूत चिदात्मासे बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानवान् अर्चिर्भिरिवाग्निः प्रत्ययैरावि- | विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव र्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभास- | धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य रूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखी | प्रत्ययोंके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा आत्मा सुखी-दुःखी है—ऐसा माना दुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । | जाता है, जैसे ज्वालाओंके कारण अग्नि । अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादा- | अतः यह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा- त्मनः। तत्र हि विज्ञानापेक्षा विप- | से भिन्न है । उसीमें विज्ञानकी अपेक्षा रीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुन- | तथा विपरीत ज्ञानत्वकी सम्भावना है— र्नित्यविज्ञाने । | नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मामें नहीं ।