भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 152 में से

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पृष्ठ 48

४० केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य निर्वर्तिता स्यात् । न ह्यन्यस्य | है, क्योंकि अपने आत्मासे भिन्न स्वात्मनो विदिताविदिताभ्याम् | किसी और वस्तुका विदित और अन्यत्वं वस्तुनः सम्भवतीत्यात्मा | अविदित दोनोंसे भिन्न होना सम्भव ब्रह्मेत्येष वाक्यार्थः; “अयमात्मा | नहीं है । अतः आत्मा ही ब्रह्म ब्रह्म” (माण्डू० २) “य आत्मा- | है—यह इस वाक्यका अर्थ है । पहतपाप्मा,” (छा० उ० ८।७।१) | यही बात “यह आत्मा ब्रह्म है” | “जो आत्मा पापसे रहित है” वाक्य-भाष्य तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न | पूर्व०—[ ऐसा माननेसे तो ] उपपद्यत इति चेत् । “आत्मानमे- | “तत्त्वमसि” ( यह ब्रह्म तू है) यह वावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) | उपदेश भी नहीं बन सकता और न इत्येवमादीनि च नित्यबोधात्म- | “अपने आत्माको ही जाना [ कि मैं कत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन | ब्रह्म हूँ ]” इत्यादि वाक्य ही सार्थक प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः | हो सकते हैं—क्योंकि ब्रह्म तो नित्य- अनर्थक इति चेत् । | बोधस्वरूप है । सूर्य दूसरेसे प्रकाशित | कभी नहीं हो सकता । इसलिये | आत्माके विषयमें ज्ञानका उपदेश | करना व्यर्थ ही होगा । न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि बोधोपदेशस्य सर्वात्मनि हि नित्य- | वह उपदेश लोगोंद्वारा किये हुए अध्यास- विज्ञाने बुद्ध्याद्यनित्य- | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये है । निरासार्थत्वम् धर्मा लोकैरध्या- | लोगोंने आत्मतत्त्वके अज्ञानवश उस रोपिता आत्माविवेकतस्तदपो- | नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मापर बुद्धि हार्था बोधोपदेशो बोधात्मनः । | आदि अनित्य धर्मोंका आरोप किया तत्र च बोधाबोधौ समञ्जसौ, | हुआ है । उसकी निवृत्तिके लिये ही | उस ज्ञानस्वरूपके ज्ञानका उपदेश | किया जाता है । | तथा उस बोधस्वरूपमें बोध और | अबोध समीचीन भी हैं, क्योंकि जैसे अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् | अग्निके कारण जलमें उष्णता रहती है

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