भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

पद-भाष्य “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० | “जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही उ० ३।४।१) “य आत्मा | है” “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३।४।१) | अन्य श्रुतियोंसे भी प्रमाणित इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । | होती है । वाक्य-भाष्य अह्निमित्तम्, रात्रयहनी इवादित्य- | तथा सूर्यके कारण दिन और रात निमित्ते। लोके नित्याचौष्ण्य- | हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण | भी अन्य (आरोपित धर्म) ही प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- | है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि | और सूर्यके तो नित्य-धर्म हैं, किन्तु भावयोर्निमित्तत्वाद नित्याविव | लोकमें अन्यत्र अपने भाव और | अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- | होते हैं; जैसे- 'अग्नि जला देगा', यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं | 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि | वाक्योंमें; वैसे ही [आत्माके विषयमें च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो | समझना चाहिये]। इस प्रकार लोकका | जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- | अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही | 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि नमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन | श्रुतियाँ आत्मज्ञानके उपदेशसे केवल श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये ही हैं। यथा सवितासौ प्रकाशयति | जिस प्रकार 'यह सूर्य अपने-आपको | प्रकाशित करता है' [ इस वाक्यसे आत्मानम् इति | प्रकाशस्वरूप सूर्यमें प्रकाशकर्तृत्वका ब्रह्मणो विदिता- | तद्वत्, बोधाबोध- | उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार विदिताभ्या- | कर्तृत्वं च नित्य- | नित्यबोधस्वरूप आत्मामें भी ज्ञान मन्यत्वम् | बोधात्मनि।तस्मात्- | और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है। | इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च | भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य' अन्यार्थे । यद्वा यदि यस्याधि | अर्थमें है। अथवा जो जिससे अधि

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