भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष- | इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेष- रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप वस्तुका ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ-- वाक्य-भाष्य तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि | (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही हुआ करता है, क्योंकि उस शब्दकी भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है; जिस प्रकार सेवक आदिसे ऊपर राजा । १ अव्यक्त अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः । | ही अविदित है, उससे यह आत्मा पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है । विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते | विदित और अविदित यानी व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये हैं उनसे भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोंसे ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं | रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है । अतः आत्मस्वरूप होनेके कारण यह त्याज्य समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न | या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन | करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती । आत्मा ही ब्रह्म है और सबका तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका विषय भी नहीं है । इसलिये यह किसी भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- | अन्यका भी हेय या उपादेय नहीं है । रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन | इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु न होनेके कारण भी [वह हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च । | हेयोपादेयरहित है]। १. जिस प्रकार सेवकोंके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे भिन्न है उसी प्रकार अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे भिन्न है ।