भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ पद-भाष्य आचार्योपदेशपरम्परया प्राप्त- | का ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ इत्यादि त्वमाह—इति शुश्रुमेत्यादि । | वाक्यद्वारा आचार्योंके उपदेशकी ब्रह्म च एवमाचार्योपदेशपरम्परया | परम्परासे प्राप्त होना दिखलाया गया एवाधिगन्तव्यं न तर्कतः प्रवचन- | है। इस प्रकार वह ब्रह्म आचार्योंकी मेधाबहुश्रुततपोयज्ञादिभ्यश्च, इति | उपदेश-परम्परासे ही ज्ञातव्य है, एवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं पूर्वे- | तर्कसे अथवा प्रवचन, मेधा, बहुश्रुत, षाम् आचार्याणां वचनम्; ये | तप एवं यज्ञादिसे नहीं—ऐसा हमने आचार्याः नः अस्मभ्यं तद् ब्रह्म | पूर्ववर्ती आचार्योंका वचन सुना है। व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्तः | जिन आचार्योंने हमारे प्रति उस | ब्रह्मका व्याख्यान—स्पष्ट कथन वाक्य-भाष्य इति शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमो- | ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ (यह हमने [हाशिये में: यथोक्तस्य आत्म-] पदेशः । व्याचच- | पूर्व आचार्योंके मुँहसे सुना है) ऐसा [हाशिये में: प्रामाणिकत्वम्] क्षिरे इत्यस्वातन्त्र्यं | कहकर यह दिखलाते हैं कि यह तर्कप्रतिषेधार्थम् । ये | [परम्परागत] शास्त्रका उपदेश है। | हमसे [शास्त्रीय मतका] व्याख्यान नस्तद्ब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं | किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना | नहीं है] ऐसा कहकर जो उन ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो | आचार्योंकी परतन्त्रता दिखलायी | है यह तर्कका प्रतिषेध करनेके लिये है; न पुनः स्वबुद्धिप्रभवेण तर्केण | जिन्होंने हमसे उस ब्रह्मका वर्णन किया | था। अर्थात् उन्होंने ब्रह्म का प्रति- उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्या- | पादन करनेवाले नित्य आगमका ही | व्याख्यान करके बतलाया था अपनी विच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । | बुद्धिसे ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं | कहा। इस प्रकार ज्ञानकी स्तुतिके तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि | लिये शास्त्रपरम्पराका अविच्छेद | दिखलाया है, क्योंकि तर्क तो भवतीति ॥ ३ ॥ | अनवस्थित और भ्रमपूर्ण भी | होता है ॥ ३ ॥ ───⊱✿⊰───