भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १

पद-भाष्य

विस्पष्टं कथितवन्तः, तेषाम् | किया था, उन्हींके [वचनसे हमें उसे जानना चाहिये] यह इसका तात्पर्य इत्यर्थः ॥३॥ | है ॥ ३ ॥

'अन्यदेव तद्विदितादथो | 'वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्य- अविदितादधि' इत्यनेन वाक्येन | द्वारा आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसा आत्मा ब्रह्मेति प्रतिपादिते | प्रतिपादन किये जानेपर श्रोताको श्रोतुराशङ्का जाता-कथंन्वात्मा | यह शंका हुई—आत्मा किस ब्रह्म । आत्मा हि नामाधिकृतः | प्रकार ब्रह्म है ? आत्मा तो कर्म कर्मण्युपासने च संसारी कर्मो- | और उपासनामें अधिकृत संसारी पासनं वा साधनमनुष्ठाय ब्रह्मादि- | जीवको कहते हैं, जो कर्म या देवान्स्वर्गं वा प्राप्तुमिच्छति । | उपासनारूप साधनका अनुष्ठान कर तत्तस्मादन्य उपास्यो विष्णु- | ब्रह्मा आदि देवताओं अथवा स्वर्गको रीश्वर इन्द्रः प्राणो वा ब्रह्म | प्राप्त करना चाहता है । अतः भवितुमर्हति, न त्वात्मा; लोक- | उससे भिन्न उसका उपास्य विष्णु, प्रत्ययविरोधात् । यथान्ये | ईश्वर, इन्द्र अथवा प्राण ही ब्रह्म तार्किका ईश्वरादन्य आत्मा | होना चाहिये—आत्मा नहीं, इत्याचक्षते, तथा कर्मिणोऽमुं | क्योंकि यह बात लोक-विश्वासके यजामुं यजेत्यन्या एव देवता | विरुद्ध है । जिस प्रकार अन्य उपासते । तस्माद्युक्तं यद्विदित- | तार्किक लोग आत्माको ईश्वरसे मुपास्यं तद्ब्रह्म भवेत्, ततोऽन्य | भिन्न बतलाते हैं उसी प्रकार कर्म- उपासक इति । तामेतामाशङ्कां | काण्डी भी 'इसका यजन करो— शिष्यलिङ्गेनोपलक्ष्य तद्वाक्याद्वा | इसका यजन करो' इस प्रकार अन्य आह-मैवं शङ्किष्ठाः, | देवताकी ही उपासना करते हैं । अतः उचित यही है कि जो उपास्य विदित है वह ब्रह्म हो और उससे भिन्न उसका उपासक.हो । शिष्यके व्याज अथवा उसके वाक्यसे उसकी इस आशंकाको उपलक्षित कर कहते हैं—ऐसी शंका मत करो,