केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ
पृष्ठ 53, कुल 152 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस [ देशकालावनिच्छन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥ पद-भाष्य यत् चैतन्यमात्रसत्ताकम्, | जो चैतन्यसत्तास्वरूप ब्रह्म वाणी- वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु | से [अप्रकाशित है]—जिह्वामूल आदि स्थानेषु विवक्तमाग्रेयं वर्णानाम् | आठ स्थानोंमें* आश्रित तथा अग्नि- अभिव्यञ्जकं करणम्, वर्णाश्चार्थ- | देवतासे अधिष्ठित वर्णोंको अभिव्यक्त सङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं | करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेतसे क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तद्- | परिच्छिन्न और इतने तथा इस | क्रमसे† प्रयुक्त होनेवाले हैं, ऐसे वाक्य-भाष्य यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो | 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्रोंका उल्लेख दृढप्रतीतेः । अन्यदेव तद्वि- | आत्मतत्त्वकी दृढप्रतीतिका लिये किया दितादिति योऽयमागमार्थो | गया है । 'यह विदितसे भिन्न है' ऐसा ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रढिम्ने मन्त्रा | जो शास्त्रका तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थने यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते । | ऊपर कहा है उसकी पुष्टिके लिये ही | ये 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं।
- जिह्वामूल, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओष्ठ और तालु । † यह मीमांसकोंका मत है, जैसे 'गौः' यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग— इस क्रमविशेषसे अवच्छिन्न वर्णरूप ही है ।