भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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४८ केनोपनिषद् [ खण्ड १


                                  पद-भाष्य

कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् | जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा- "सा वाग्यया स्वप्ने भाषते" इति। | कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् | द्वारा जीव स्वप्नमें बोलता है वह चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि | वाक् है" वक्ताकी वह नित्य वाचन- वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते" | शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूप वाक् (बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति | है जैसा कि "वक्ताकी वाचन- श्रुतेः। | शक्तिका लोप कभी नहीं होता" | इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म | उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत् निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा- ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । | संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान। जिन वाक् यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् | आदि उपाधियोंके कारण, वाणीका चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो | वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता | मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता, नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- | नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः | विज्ञान और आनन्दस्वरूप है— संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- | इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस र्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, | अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट | समस्वरूप ब्रह्ममें प्रवृत्त होते हैं,

                                वाक्य-भाष्य

निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपमें ही | जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान' आज्ञायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे | उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद- यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपा- | मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका | उपास्यत्व निषेध करनेके कारण स्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४॥ | [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त | करता है] ॥ ४॥