भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 152 में से

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पृष्ठ 59

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ पद-भाष्य मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- | द्वारा मत--विषयीकृत अर्थात् व्याप्त विदः । तस्मात् तदेव मनस | बतलाते हैं; उस मनके प्रत्यक्चेतयिता आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म | आत्माको ही तू ब्रह्म जान । 'नेदं••••' विद्धि। नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ | इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ जिसे कोई नेत्रसे नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र [ अपने विषयोंको ] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देश- कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥ पद-भाष्य यत् चक्षुषा न पश्यति न | लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति- विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- | से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात् संयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि | विषय नहीं करता किन्तु जिस चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओं अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- | अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंके भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी र्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोंको देखता—विषय करता यानी व्याप्त करता है उसीको तू ज्योतिषा विषयीकरोति व्या- | ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना प्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥६॥ | चाहिये ॥६॥ वाक्य-भाष्य इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, | किया जाता है। जो सब इन्द्रियोंका तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि | अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया | अवभासित होनेके कारण जिससे वे