भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

पद-भाष्य च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । | उच्छेद और नाश आदिमें वह स्वतस्तु "अविज्ञातं विजानतां | उनका अनुकरण करनेवाला है; विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः २।३) इति स्थितं भविष्यति । | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात | है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात | है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा । यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण | 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व- सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मो- | वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध | है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधिसे पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- | अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि | अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य | इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओंमें जानता है वह भी | निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति | जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ । मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि | इसका जो अध्यात्मरूप है और जो | देवताओंमें है वह भी उपाधि- देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- | परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | ( अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु वाक्य-भाष्य मन्ये विदितमिति शिष्यस्य | 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी | मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है—क्योंकि ऐसा माननेपर ही | तीन प्रकारकी प्रतीतियोंकी सङ्गति सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है । सम्यक् वस्तुके निश्चयके | लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब विचालितः शिष्य आचार्येण | आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते | ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने