भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् | जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणोंसे अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं | रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय | भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। | सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है— | यह इसका अभिप्राय है। यत एवम् अथ नु तस्मात् | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव | अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्मको ते तव ब्रह्म। एवमाचार्योक्तः | विचारणीय ही समझता हूँ। शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- | आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | एकान्तमें बैठकर समाहित हो आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च | आचार्यके बतलाये हुए आगमको निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, | अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच— | निश्चयकर आत्मानुभव करनेके मन्येऽहमथेदानीं विदितं | अनन्तर आचार्यके समीप आकर ब्रह्मेति ॥१॥ | कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब | मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥ वाक्य-भाष्य समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमें समाहित चित्तसे पूर्वोक्त सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा- | प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर र्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- | भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र, | आचार्य और अपना अनुभव—इन त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- | तीनों प्रतीतियोंकी एक ही विषयमें निश्चिता विद्या सफला स्यान्न | संगति करनेके लिये कहा [ मैं ब्रह्मको अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो | ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] । इससे यह | न्याय दिखलाया गया है कि इस भवति; मन्ये विदितमिति | प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही परिनिश्चितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- | सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि | 'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि- हेतूकेः ॥ १ ॥ | निश्चित—निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके | हेतुका ही प्रतिपादन किया गया है ॥१॥