भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ पद-भाष्य कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये— अनुभूतिका उल्लेख नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥ मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता- विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥ पद-भाष्य न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ— | ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी | मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं | हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता | है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद | च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये । वाक्य-भाष्य परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय | समान ही है—यह दिखलानेके लिये प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित | किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'— | ऐसा कहकर वह उसका हेतु मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।


  • यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।