भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य

कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं— नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस | ब्रह्मको जानता है।' किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ? | ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी | नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है' | इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु- वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे

वाक्य-भाष्य

विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित | और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है। तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है। अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह | अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म- ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता' | —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई | विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।