भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 152 में से

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पृष्ठ 79

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१ पद-भाष्य न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो | 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि | उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके | पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि वाक्य-भाष्य कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के- स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है । अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम- मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये | 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है । तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म- विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे अविज्ञात—अविदित है, | इसलिये वही ज्ञान है । और जो | अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि