भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती हैं बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों- दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमें ही लक्षित लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग नहीं है । अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीस्वरूपसे ब्रह्मणोऽभेद- तदा तन्मतं तत्- जाना जाता है उसी समय 'प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोंका साक्षी होनेपर ही वाक्य-भाष्य बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- बोधके प्रति ) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः प्रतीतियोंमें [ ब्रह्मकी ] व्याप्ति सूचित करनेके लिये है । बुद्धिजनित सम्पूर्ण तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानस्वरूपात्म- प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके व्याप्तत्वाद् विज्ञानस्वरूपावभासाः, कारण उस विज्ञानस्वरूपसे ही अवभासित हैं तथा उनसे पृथक् उनका तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [ लोहपिण्डमें व्याप्त हुए ] अग्निके समान उनसे सर्वथा लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है । अतः वे ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमें द्वारस्वरूप हैं । इसलिये प्रत्येक बौद्ध तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमें जो प्रत्यगात्म-