केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पद-भाष्य भिभवितुम् । यत एवमात्म- | मृत्युका पराभव कर सकता है । विद्याकृतं वीर्यमात्मनैव विन्दते, | क्योंकि [ मुमुक्षु पुरुष ] इस प्रकार अतः विद्यया आत्मविषयया | आत्मविद्याजनित वीर्यको आत्माद्वारा विन्दतेऽमृतम् अमृतत्वम् । | ही प्राप्त करता है, इसलिये आत्म- “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” | सम्बन्धिनी विद्यासे ही अमरत्व प्राप्त ( मु० उ० ३ । २ । ४ ) इत्या- | करता है । अथर्ववेदीय ( मुण्डक ) थर्वणे । अतः समर्थो हेतुः अमृ- | उपनिषदमें कहा है—“यह आत्मा तत्वं हि विन्दत इति ॥४॥ | बलहीन पुरुषको प्राप्त होने योग्य | नहीं है” । अतः यह आत्मविद्यारूप | हेतु [ मृत्युका निवारण करनेमें ] | समर्थ है क्योंकि इससे अमरत्व | प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ ❧❦❧ कष्टा खलु सुरनरतिर्यक्प्रेता- | जिनमें सांसारिक दुःखोंकी बहुलता दिषु संसारदुःखबहुलेषु प्राणि- | है उन देवता, मनुष्य, तिर्यक् और निकायेषु जन्मजरामरणरोगादि | प्रेतादि प्राणियोंमें अज्ञानवश संप्राप्तिरज्ञानात् । अतः— | जन्म, जरा, मरण और रोगादिकी | प्राप्ति होना निश्चय ही बड़े दुःखकी | बात है । अतः— वाक्य-भाष्य वा विदितं मतमिति । उभयत्र | हुआ ही मत (जाना हुआ) है। प्रतिबोधशब्दप्रयोगोऽस्ति सुप्त- | सोनेसे जागा हुआ तथा गुरुद्वारा प्रतिबुद्धो गुरुणा प्रतिबोधित | प्रतिबोधित—दोनों ही जगह इति । पूर्वं तु यथार्थम् ॥ ४ ॥ | ‘प्रतिबोध’ शब्दका प्रयोग होता है । | परन्तु इन तीनोंमें सबसे पहला अर्थ | ही ठीक है ॥ ४ ॥ 〰〰〰〰〰〰