भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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८२ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य एवं मर्त्यत्वमात्मनो यद- | इसी प्रकार आत्माकी मृत्यु भी विद्यया अनात्मत्वप्रतिपत्तिः। | अविद्यावश उसमें अनात्मत्वकी | उपलब्धि ही है । कथं पुनर्यथोक्तयात्मविद्यया- | तो फिर उपर्युक्त आत्मज्ञानसे | किस प्रकार अमरत्व लाभ कर ज्ञानेनामृतत्व- मृतत्वं विन्दत इत्यत | लेता है ? इसपर कहते हैं— प्राप्तिप्रकारः आह—आत्मना स्वेन | [ मुमुक्षु पुरुष ] आत्मा अर्थात् रूपेण विन्दते लभते वीर्यं बलं | अपने स्वरूपके ज्ञानसे वीर्य—बल | यानी [ अमरत्व-प्राप्तिका ] सामर्थ्य सामर्थ्यम् । धनसहायमन्त्रौषधि- | प्राप्त करता है। धन, सहाय, मन्त्र, | ओषधि, तप और योगसे प्राप्त तपयोगकृतं वीर्यं मृत्युं न | होनेवाला वीर्य अनित्य वस्तुका किया शक्नोत्यभिभवितुम् अनित्यवस्तु- | हुआ होनेसे मृत्युका पराभव करनेमें कृतत्वात्; आत्मविद्याकृतं तु वीर्य- | समर्थ नहीं है; किन्तु आत्मविद्यासे | होनेवाला वीर्य तो आत्माद्वारा ही मात्मनैव विन्दते, नान्येन इत्यतो- | प्राप्त किया जाता है—अन्य किसीसे | नहीं। इसलिये आत्मविद्याजनित ऽन्यसाधनत्वादात्मविद्यावीर्यस्य | वीर्य किसी अन्य साधनसे प्राप्त तदेव वीर्यं मृत्युं शक्नोत्य- | होनेवाला नहीं है; अतः वही वीर्य वाक्य-भाष्य अथवा प्रतिबोधविदितं मत- | अथवा 'प्रतिबोधविदितं मतम्' इस मिति सकृदेवाशेषविपरीतनिरस्त- | वाक्यका ऐसा अर्थ समझना चाहिये कि संस्कारेण स्वप्नप्रतिबोधवद्यद्वि- | स्वप्नसे जागे हुएके समान जिसके सम्पूर्ण | विपरीत संस्कारोंका एक बार ही बाध हो दितं तदेव मतं ज्ञातं भवतीति । | गया है, उसीसे जो जाना जाता है वही अथवा गुरूपदेशः प्रतिबोधस्तेन | मत अर्थात् ज्ञात होता है। अथवा गुरू- | का उपदेश ही प्रतिबोध है, उससे जाना