केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ पद-भाष्य ज्ञानं प्रतिबोध इत्यपरे; नि- | [मुक्तिके कारणभूत] एक बार | होनेवाले विज्ञानको ही प्रतिबोध र्निमित्तः सनिमित्तः सकृद्वासकृद्वा | समझते हैं—[वे कुछ भी माना | करें] बिना निमित्तसे हो अथवा प्रतिबोध एव हि सः। अमृतत्वम् | निमित्तसे तथा एक बार हो अथवा | अनेक बार वह सबका सब प्रति- अमरणभावं स्वात्मन्यवस्थानं | बोध ही है [इसका विशेष विवेचन | करनेसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है]। मोक्षं हि यस्माद् विन्दते लभते | क्योंकि मुमुक्षुगण उपर्युक्त प्रतिबोध- | से अर्थात् प्रत्येक बौद्ध प्रत्ययमें यथोक्तात् प्रतिबोधात्प्रतिबोध- | होनेवाले आत्मज्ञानसे ही अमृतत्व— | अमरणभाव अर्थात् अपने आत्मामें विदितात्मकात्, तस्मात्प्रतिबोध- | .स्थित होनारूप मोक्ष प्राप्त करते हैं। | अतः वह (ब्रह्म) प्रत्येक बोधमें विदितमेव मतमित्यभिप्रायः । | अनुभव होनेवाला ही माना गया है— | ऐसा इसका अभिप्राय है। क्योंकि बोधस्य हि प्रत्यगात्मविषयत्वं | बोधका प्रत्यगात्मविषयक होना ही | अमृतत्वमें कारण माना गया है। च मतममृतत्वे हेतुः। न ह्यात्मनोऽ- | आत्माकी अनात्मरूपता उसके | अमृतत्वका कारण नहीं हो सकती । नात्मत्वममृतत्वं भवति । आत्म- | आत्माका अमरत्व उसका स्वरूप- त्वादात्मनोऽमृतत्वं निर्निमित्तमेव, | भूत होनेके कारण अहैतुक ही है। वाक्य-भाष्य लोकेऽपि विद्याजमेव बलमभि- | लोकमें भी विद्याजनित बल ही दूसरे | बलोंका पराभव करता है, शरीर आदि- भवति न शरीरादिसामर्थ्यं यथा | का बल नहीं; जैसे हाथी-घोड़े आदिके | शारीरिक बल [मनुष्यके] विद्याजनित हस्त्यादेः । | बलको नहीं दबा सकते।