भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 152 में से

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पृष्ठ 88

८० केनोपनिषद् [ खण्ड २


पद-भाष्य

संस्कृत (पद-भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
त्वात्स‌ंवेदनान्तरापेक्षा च नप्रकाशको किसी अन्य प्रकाशकी
सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रका-अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी
शान्तरापेक्षाया न सम्भवः तद्वत् ।प्रकार ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे [ अपने ज्ञानके लिये ] किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है।
बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तुतथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञानकी
क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं चस्वसंवेद्यता स्वीकार करनेपर भी उसकी
विज्ञानस्य स्यात्; “न हि विज्ञातु-क्षणभङ्गुरता और निरात्मकता सिद्ध
र्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽवि-होने लगेगी । [ ऐसा होनेपर ]
नाशित्वात्” (बृ० उ० ४।३।३०)“अविनाशी होनेके कारण विज्ञाताकी
“नित्यं विभुं सर्वगतम्” (मु०विज्ञातिका लोप नहीं होता”
उ० १ । १ । ६) “स वा एष“नित्य विभु और सर्वगत है” “वह
महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽ-यह महान् अज आत्मा अजर अमर
भयः” (बृ० उ० ४।४।२५)अमृत और अभयरूप है” इत्यादि
इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् ।श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी ।
यत्पुनः प्रतिबोधशब्देनइसके सिवा जो लोग प्रति-
प्रतिबोधार्थ- निर्निमित्तो बोधः प्रति-बोधशब्दसे, जैसा कि सुषुप्त पुरुषको
विचारः बोधः यथा सुप्तस्यहोता है वह निर्निमित्त बोध ही
इत्यर्थं परिकल्पयन्ति, सकृद्वि-प्रतिबोध है—ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं अथवा जो दूसरे लोग

वाक्य-भाष्य

संस्कृत (वाक्य-भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
अविद्याजं हि वीर्यं विनाशि।अविद्यासे होनेवाला बल नाशवान्
विद्ययाविद्याया बाध्यत्वात् । नहोता है, क्योंकि अविद्या विद्यासे बाधित
तु विद्याया बाधकोऽस्तीतिहो जाती है। किन्तु विद्याका बाधक
विद्याजममृतं वीर्यम् । अतोऔर कोई नहीं है, अतः विद्याजनित
विद्यामृतत्वे निमित्तमात्रं भवति।वीर्य अमृत होता है। इसलिये विद्या तो अमृतत्वमें केवल निमित्तमात्र होती
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”है। आथर्वण श्रुतिमें भी कहा है—"यह
इति चाथर्वणे (मु० उ० ३।२।४)आत्मा बलहीनसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है"।
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