भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

४८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ वाक्य-भाष्य

[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)] सगुणोपासनार्थो वापोदित- त्वात। नेदं यदिदमुपासत इत्यु- पास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदित- त्वादतुपास्यत्वे प्राप्ते तस्यैव ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैवमध्यात्मं चोपासनं विधातव्यमित्येवमर्थो वा। इत्यधिदैवतं तद्वनमित्युपा- सितव्यमिति हि वक्ष्यति। ब्रह्मेति परो लिङ्गात् । न (पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मपदामिप्रायः) ह्यन्यत्र परादीश्वरात् नित्यसर्वज्ञात् परि- भूयाग्न्यादींस्तृणं वज्रीकर्तुं सामर्थ्यमस्ति तन्न शशाक दग्धुमित्यादिलिङ्गाद्ब्रह्मशब्दवाच्य ईश्वर इत्यवसीयते । न ह्यन्यथा- ग्निस्तृणं दग्धुं नोत्सहेते वायुर्वा- दातुम् । ईश्वरेच्छया तृणमपि वज्रीभवतीत्युपपद्यते। तत्सिद्धि- र्जगतो नियतप्रवृत्तेः ।


[हिन्दी-अनुवाद (दक्षिण स्तम्भ)] अथवा यह सगुणोपासनाका विधान करनेके लिये भी हो सकता है, क्योंकि पहले ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध कर चुके हैं। पहले 'नेदं यदिदमुपासते' इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध हो चुका है; इस प्रकार निषिद्ध हो जानेसे ब्रह्मकी अनुपास्यता प्राप्त होनेपर उसी ब्रह्मकी सगुणभावसे अधिदैव या अध्यात्म उपासना करनी चाहिये इसीको बतलानेके लिये यह अर्थवाद हो सकता है, जैसा कि आगे चलकर 'तद्वनमित्युपासितव्यम्' इस [४।६ मन्त्र] से उसके अधिदैवरूप- के उपास्यत्वका वर्णन करेंगे। 'ब्रह्म' इस शब्दसे यहाँ परमात्मा (ईश्वर) समझना चाहिये, क्योंकि यहाँ उसीकी सूचना देनेवाले लिंग (चिह्न) देखे जाते हैं । नित्यसर्वज्ञ परमेश्वरको छोड़कर और किसीमें अग्नि आदि देवताओंका पराभव करके तृणको वज्र बना देनेकी शक्ति नहीं हो सकती। अतः 'तन्न शशाक दग्धुम्' (उसे अग्नि नहीं जला सका) इत्यादि लिंगसे ब्रह्मशब्दका वाच्य ईश्वर ही है—ऐसा निश्चित होता है। इसके सिवा और किसी कारणसे अग्नि तृणको जलानेमें और वायु उसे उड़ानेमें असमर्थ नहीं हो सकते थे। हाँ, यह ठीक है कि ईश्वरकी इच्छासे तो तृण भी वज्र हो जाता है। उस ईश्वरकी सिद्धि संसारकी नियमित प्रवृत्तिसे होती है।