भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

४८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावस्वरूपः स्वयम्, भेदोऽन्यस्माच्च स्वस्य, तदाऽस्य भेदस्य स्वात्मप्रतियोगिक- त्वेन स्वाश्रयत्वेन चाङ्गीकारे स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः किं नाङ्गीक्रियते, विरोधाभावात् । स्वीक्रियेताप्येवं यदि तथा प्रतीतिर्व्यवहारो वा स्यादिति चेन्न । अस्त्यपि शब्दाभासादेस्तथा प्रतीतिराभासशब्दव्यवहारश्च । सत्यौ प्रतीतिव्यवहारौ स्वीकारकारणम् । न च तौ स्वात्मन एव स्वस्माद् भेद- विषयौ स्त इति चेन्न । स्वात्मा स्वस्यैवाधिकरणमवधिश्चेत्यपि तर्हि न सत्या प्रतीतिः सम्भवति, न वा व्यवहारः । तत्कथमित्थमङ्गीकुरुषे ? ननु न वयं स्वात्मा स्वाधिकरणं स्वावधिर्वेत्यभ्युपगच्छामः ; किन्तु धर्मा- न्तरे तत्प्रतियोगिके तदाधारे वा स्वीकृते यौ बुद्धिव्यवहारावुपपद्येते तावनवस्था- भयाद्धर्मान्तरमन्तरेणैव स्वभावाद्भेदः करोतीति ब्रूम इति चेत् । तर्ह्यन्यत्र यादृशी के अनुरोध से वही भेद स्व का प्रतियोगी और स्व का आश्रय ( अवधि ) भी हुआ । यदि घटादि से स्व का भेद स्वस्वरूप मान लिया जाय, तो भेद के स्वप्रतियोगिक और स्वाश्रय मानने से 'स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः' ऐसी प्रतीति होने लगेगी, कारण इसमें कोई विरोध नहीं रहा । समर्थन--ऐसा स्वीकार करते, यदि स्व से स्व में भेदावगाही व्यवहार या बुद्धि होती । किन्तु वैसा व्यवहार या बुद्धि नहीं होती । अतः स्व से स्व में भेद नहीं मानते । खंडन--शब्दाभासरूप व्यवहार तथा शब्दाभास से स्व से स्व में भेदबुद्धि भी होती ही है । समर्थन--सत्य व्यवहार तथा सत्य बुद्धि उक्त स्वीकार के कारण मानेंगे । स्व से स्व में भेदावगाही सत्यबुद्धि या सत्य व्यवहार नहीं होता । अतः स्व से स्व में भेद सत्य सिद्ध नहीं होता । खण्डन--तब तो भेद स्वयं स्व का अधिकरण है और स्व का प्रतियोगी है ऐसी सत्य प्रतीति या सत्य व्यवहार नहीं होता । फिर आप भेद को स्व ( भेद ) का अधिकरण तथा प्रतियोगी कैसे मानते हैं ? समर्थन--'भेद स्व ( भेद ) का अधिकरण और प्रतियोगी है' ऐसा हम नहीं मानते । किन्तु यदि भेद में अन्य भेद को मान लें, तो उसमें जैसे भेदप्रतियोगिकत्व तथा भेदाश्रयत्व का व्यवहार या बुद्धि होती है, वैसे ही अनवस्था के भय से स्व में अन्य भेद को न मानकर भेद स्वभाव से ही भेद-व्यवहार करता है, ऐसा हम कहते हैं ।