खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८७
प्रतीतिर्धर्मान्तरविषया तादृश्येवात्र विना धर्मान्तरमुत्पद्यत इति भ्रान्ता स्यात् । यस्य च स्वभावस्य वलेनेदृशी सा जायते स दोषः स्यात् । यथा सत्यरजते रजतप्रतीतो रजतत्वादुत्पन्नाऽन्यत्र विना रजतत्वं जायमाना भ्रान्ता सा भवति, यस्य च सामर्थ्यात् सा तादृशी जायते स दोष इत्युच्यते । तत्र रजतत्वं नास्ति, अत्र धर्मिरूपोऽपि भेद एव सन्नवलम्बनमिति चेत् । मैवम् ; भिन्नप्रतीतिर्विशिष्टविषया भेदतदाश्रयरूपोभयवस्तुविषया अन्यत्र यादृशी सत्याऽङ्गीकृता ततो मात्रयाऽप्यन्यूनाथांया इह जायमानाया यदि द्वयं विषयं नाङ्गीकुरुषे, तदा शक्रेणापि भ्रान्तत्वं दुर्वारम् । अथाङ्गीकुरुषे, तदाऽनवस्थाप्रसङ्गः । अथ तदुभयविषयव्यतिरेकेणैव साऽत्र सत्याऽन्यत्र, तर्हि इतोऽन्यादृशविषया मिथ्या स्यादित्यलं पल्लवेन । यत्तु सत्तेवेत्युक्तम् ; तत् कटकर्गवोदाहरणमनुहरति, यतः सत्ताऽप्यमुना दूषणेनास्माभिः खण्डनीया । खंडन—तब तो भेदविषयक बुद्धि जैसे यहाँ होती है, वैसे ही भेद के बिना अन्य स्थल में भी हो जायगी। अतः वह बुद्धि भ्रम और जिस स्वभाव के बल से वैसी होती है, वह स्वभाव दोष कहलायेगा । जैसे सत्यरजत स्थल में रजतत्व के होने से रजतत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही यदि अन्यत्र रजतत्व के बिना रजतत्व-बुद्धि भ्रम कहलाती है और जिसके बल से वह होती है, वह दोष कहलाता है । समर्थन—वहाँ रजत नहीं है और यहाँ तो धर्मिरूप भेद विद्यमान ही अवलम्ब है, अतः दोनों स्थलों में महान् अन्तर है । खण्डन—भेद और भेदाश्रय को विषय करनेवाली विशिष्टविषयक भिन्न बुद्धि अन्यत्र जैसे सत्य होती है, उससे किञ्चित् अन्यून विषयवाली यहाँ जायमान बुद्धि का विषय दोनों को न मानें, तो इन्द्र भी उस बुद्धि के भ्रान्तत्व का निवारण नहीं कर सकता । यदि दोनों को विषय मान लें, तो अनवस्था हो जायगी । यहाँ उभय के विषय न होने पर भी यदि उक्त बुद्धि को सत्य मानें, तो अन्यत्र जहां उभय विषय हैं, वहाँ वह बुद्धि मिथ्या हो जायगी । बस, इतना ही खण्डन पर्याप्त है, विस्तार व्यर्थ है । फिर, आप जिस सत्ता का दृष्टान्त देते हैं, वह दृष्टान्त भी इसी युक्ति से खण्डित होने से शिविर की गौके सादृश्य का अनुकरण करता है । अर्थात् जैसे शिविर में बन्धन से रहित उन्मत्त वृषभ जहाँ-जहाँ दौड़ता हुआ जाता है, वहीं पीटा जाता है, वैसे ही यहाँ भी सत्ता को खण्डित ही जानिये ।