खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
यत्पुनरभिधीयते किमेतैर्भेदखण्डनवादिभिरभिहितं भवति — किं भेदज्ञानमेव नास्ति, सदपि नित्यम्, अनित्यमपि वा निर्हेतुकम्, सहेतुकमपि वा निर्वि- षयम्, सविषयमपि वा बाध्यमानविषयम् ? तत्र प्रथमः सर्वतो विरोधादनुत्तरः । द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपेक्षणीयः । तृतीयोऽपि विरोद्धाद्धेयः । चतुर्थस्तु भेदोल्लेखादेव त्याज्यः । पञ्चमश्चिन्त्यते । किमेतेष्वन्यतमो विषयः तदन्यो वा ? द्वितीये किमेताभि- र्व्यधिकरणाानुपपत्तिभिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चौरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य- निग्रहः । अथान्यतमात्मा, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वं तदाऽनवस्थाभिया तदधिकः प्रवाहस्त्यज्यताम् । तस्य कुतस्त्यागः, न ह्यनवस्था प्रतिभासमानमर्थं
समर्थन —उदयनाचार्य कहते हैं कि भेद का खण्डन करनेवाले का क्या अभि- प्राय है ? क्या भेद का ज्ञान ही नहीं होता या भेद का ज्ञान तो होता है, पर वह नित्य है, अथवा अनित्य होता हुआ भी हेतु से रहित है, किंवा सहेतुक होकर भी विषय से रहित है, या सविषय होता हुआ भी बाधित-विषयक है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण यदि भेद-ज्ञान नहीं है, तो आपका भेद-खण्डन तथा 'भेदो नास्ति' इत्यादि सभी प्रयोग असङ्गत हो जायेंगे । द्वितीय भी सुषुप्ति-अवस्था के अनुरोध से त्याज्य है । अर्थात् जिस अवस्था में ज्ञान न हो, वह अवस्था सुषुप्ति है । सुषुप्ति अनुभवसिद्ध है, अतः उसके अनुरोध से ज्ञान अनित्य है । 'अनित्य निश्चय ही हेतुजन्य होता है' इस अनुभव से विरोध होने के कारण तृतीय पक्ष भी हेय है । भेदरूप विषय का उल्लेख अनुभव सिद्ध है, अतः चतुर्थ पक्ष भी त्याज्य है । 'भेदज्ञान सविषय होता है, परन्तु बाधित-विषय है' यह पञ्चम पक्ष अवश्य विचारणीय है । क्या भेदज्ञान का विषय स्वरूप, अन्योन्याभाव या वैधर्म्य इन तीनों में से कोई एक है या इनसे अन्य ? यदि इनसे अन्य विषय है, तो इन स्वरूपादि के खण्डन की युक्तियों से उसका खण्डन क्या हुआ ? ऐसा करने पर स्पष्ट ही यह चोर के अपराध में माण्डव्य को ही दण्ड हुआ¹। यदि स्वरूपादि में से एक को विषय मानें, तो उसमें धर्मान्तर (वैधर्म्य) को मानें तो अनवस्था-भय से उस प्रथम वैधर्म्य से अधिक वैधर्म्य-परम्परा का त्याग कीजिये, उस प्रथम वैधर्म्य का त्याग कैसे होगा; कारण
१. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि माण्डव्य मुनि चोर न होते हुए भी उन्हें चोर मानकर शूली पर चढ़ा दिया गया ।