भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८६ निवर्तयति, किन्तु प्रवाहं परिहारयति गन्धे गन्धान्तरवत् । अथेतरेतराभावमेव भेदज्ञानमालम्बते तदाऽपि काऽऽत्माश्रयः, तेन हि भेदज्ञानमेव न स्यात् । अस्ति च तत्, ततो हेत्वन्तरमाक्षिपेत् , न तु स्वात्मनि स्वयमहेतुत्वे स्वयमेव निवर्तेत । अविद्यावशादिति चेत् ; किञ्चातः ? न ह्यविद्येत्येव आत्माश्रयनिवृत्तिः; तथा सति घटादयोऽपि कुलालादिनिरपेक्षाः स्वयमेव भवेयुः । अथाऽऽत्माश्रयादिदोषोपहततया तन्न तस्यैव कारणम् । अतो यतः कुतश्चि- त्तस्य जन्म, तच्च दुर्निरूपमतोऽविद्येत्युच्यत इति विचारार्थः ; नाम्नि तर्हि विवादः । न च तदपि दुर्निरूपम् , प्रतियोगित्वेन अप्रतीतावधिकरणस्वभावत्वेन अधि- करणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च इतरेतराभावग्रहण- कारणमिति निरूपणात् । अनवस्था अनुभव के विषय अर्थ की निवृत्ति नहीं कराती, किन्तु प्रवाह रुकवाती है, जैसे कि गन्ध में अन्य गन्ध का । फिर यदि भेदज्ञान अन्योन्याभावरूप भेद का अवलम्बन करे, तब भी आत्माश्रय कहाँ है ? यदि आत्माश्रय हो, तो भेदज्ञान ही नहीं होगा । किन्तु भेदज्ञान होता है, अतः वह स्व से अन्य हेतु की कल्पना करेगा, कारण स्व में स्वयं हेतु न होने से स्वयं निवृत्त नहीं होता । यदि कहें कि अविद्या से भेद-ज्ञान होता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण अविद्या से क्या होता है ? अविद्या से ही आत्माश्रय की निवृत्ति तो होगी नहीं । कारण यदि अविद्या से आत्माश्रय की निवृत्ति होती हो, तो घटादि भी कुलालादि की अपेक्षा के बिना स्वतः अविद्या से ही उत्पन्न होने लगेंगे । फिर कुलालादि को घटादि का कारण क्यों माना जाय ? यदि कहें कि 'आत्माश्रय दोष होने से घट स्वयं अपना ही कारण नहीं होता, किन्तु अन्य किसीसे जन्य होता है । उस कारण का निरूपण अशक्य है, अतः उसे अविद्या कहते हैं—यही हमारे कथन का आशय है' तब तो केवल दोनों के नामों में ही विवाद रहा । भेद-प्रतीति के कारण को आप 'अविद्या' कहते हैं, तो हम नामान्तर से कहते हैं । फिर, उसके कारण का निरूपण भी अशक्य नहीं है, कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अप्रतीति-काल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण का ज्ञान तथा अधिकरण- ६२