किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ )
यही नहीं सरोवर का वर्णन, सूर्यास्त एवं रात्रि का वर्णन एवं प्रभात-वर्णन सभी उन्होंने कुशलता के साथ किया है। सब में सजीवता है और है एक अनूठापन।
वीर रस के वर्णन में भारवि अद्वितीय तो हैं ही शृङ्गार रस के वर्णन में भी वे कम नहीं। कालिदास में शृङ्गार का वर्णन है, किन्तु भारवि के समान वासना और विलासिता से परिपूर्ण नहीं। रघुवंश के अन्तिम सर्ग में कालिदास का शृङ्गार-वर्णन वासना से ओत-प्रोत है अवश्य, किन्तु भारवि इस क्षेत्र में उनसे बढ़ गये हैं। भारवि का शृङ्गार-वर्णन अत्यधिक उत्तेजक, ऐन्द्रिय एवं वासनामय है। अप्सराओं का वनविहार, पुष्पावचय, रतिकेलि, जलक्रीडा सबके वर्णन में शृङ्गार का नग्न वर्णन उन्होंने किया है। 'किरातार्जुनीयम्' के आठवें, नवें एवं दशवें सर्ग में इनका शृङ्गार-वर्णन देखा जा सकता है। उदाहरणार्थः —
विहस्य पाणौ विवृते धृताम्भसि प्रियेण वध्वा मदनाद्र्रचेतसः।
सखीव काञ्ची पयसा घनीकृता बभार वीतोच्चयबन्धमंशुकम्॥ (८. ५१)
'जलविहार के समय किसी नायिका ने हाथ में पानी लेकर नायक पर उछालना चाहा, इसे देखकर प्रिय ने हंसकर हाथ पकड़ लिया। स्पर्श के कारण नायिका का मन कामासक्त हो गया, उसका नीवीबंधन ढीला हो गया, पर पानी से सिमटी हुई करधनी ने उसके अंशुक को इसी तरह रोक लिया, जैसे वह सखी के समान ठीक समय पर नायिका की सहायता कर रही हो।'
उनके वर्णन की प्रभावोत्पादकता के विषय में प्रो० कीथ का कथन है—
'His style, at its best, has a calm dignity which is certainly attractive, while he excels also in the observation and record of the beauties and of maidens'.
पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी भारवि सफल हुए हैं। महाभारत के क्रोधी भीम को महाकवि ने काव्य में एक कुशल नीतिज्ञ का रूप दिया है। अर्जुन की वीरता का वर्णन करने के लिए किरात एवं किरातसेना के साथ युद्ध दिखा कर उन्हें विजयी ही दिखाया है। युधिष्ठिर को नीतिज्ञता एवं शान्तिप्रियता का भी चित्रण उन्होंने कुशलता से किया है।
भारवि ने अपने काव्य को अलङ्कारों से सुसज्जित करने का प्रयत्न किया है। उनकी उपमाओं में कालिदास की उपमाओं के समान न तो स्वाभाविकता है और न आकर्षण। अपनी एक उपमा के कारण उन्हें 'आतपत्र-भारवि' की उपाधि भी मिली है। इस उपमा में इन्होंने कमल के उड़ते हुए पराग को लक्ष्मी के आतपत्र की उपमा दी है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, समासोक्ति, निदर्शना के अतिरिक्त यमक, श्लेष तथा प्रहेलिकादि चित्रकाव्यों में भी ये दक्ष हैं। उनके अर्थान्तरन्यास का एक उदाहरण यह है :—