भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 707 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

( १३ )

दनुजः स्विदयं क्षपाचरो वा वनजे बलं बतास्ति सत्त्वे ।
अभिभूयः तया हि मेघनीलः सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥ ८ ॥

अतिशयोक्ति का उदाहरण :—
अपयनन्धुरः शिवान्तिकस्थैर्विवरेत्सद्भिरिमित्सया जिहानः ।
युगपद् ददृशे विशन्वराहं तदुपोढैश्च नमश्चरैः पृथक्तः ॥ २३ ॥

और यह है उनकी उपमा का एक उदाहरण :—
स तमालनिभे रिपौ सुराणां घननीहार इवाविवक्तवेगः ।
भयविप्लुतमीक्षितो नमःस्थैर्जगतीं ग्राह इवापगां जगाहे ॥ २४ ॥

कालिदास का अनुकरण करके इन्होंने व्याकरण से सम्बन्धित उपमाएं भी दीं है उनमें भी कालिदास के समान सफल नहीं हो पाये हैं। यथा—
स भवस्य भवक्षयैकहेतोः सितसप्तेश्च विधास्यतोः सहार्थम् ।
रिपुराप पराभवाय मध्यं प्रकृतिप्रत्ययोरिवानुबन्धः ॥ १९ ॥

उनकी श्लेषाङ्गप्राणितोपमा निम्न छन्द में देखी जा सकती है :—
इति तेन विचिन्त्य चापनाम प्रथमं पौरुषचिह्नमाललम्बे ।
उपलब्धगुणः परस्य भेदे सचिवः शुद्धः इवाददे च बाणः ॥ १३-१४ ॥
कथाप्रसंगेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः ।
तवाभिधानाद्व्यथते नताननः सुदुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः ॥ १२ ॥

और यह है उनकी एक मालोपमा :—
अविवेकवृथाक्षमाविधार्यै क्षयलोभादिव संश्रितानुरागम् ।
विजिगीषुमिवानयप्रमादादवसादं विशिखौ विनिन्यतुस्तम् ॥ १३. २९ ॥

महाकवि भारवि की हृदयग्राही उक्तियाँ उनकी एक प्रमुख विशेषता है। वे राजनीति के निष्णात पण्डित थे और राजनीतिक ग्रन्थों का उन्हें पूर्ण ज्ञान था। उनके काव्य में सुन्दर उक्तियों का अभाव नहीं है जो अनायास ही काव्य में एक नवीन जीवन डाल देती है। यथा—
‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।’, ‘सहसा विदधीत न क्रियाम् ।’
‘विमलं कलुषीभवच्च चेतः कथयत्येव हितैषिणं रिपुं वा ।’
‘संवृणोति खलु दोषमज्ञता ।’, ‘परवृद्धिषु बद्धमत्सराणां
किमिव अस्ति दुरात्मनामलङ्घ्यम्’ इत्यादि।

यही कारण है कि इनके काव्य में एक मनोरम गाम्भीर्य है और व्यावहारिक ज्ञान की चमत्कारिणी प्रौढ़ता भी।