भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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भारवि की कविता अपनी सर्वोत्तम अवस्था में प्रसादगुण युक्त है। यद्यपि कालिदास के समान प्रसादगुण भारवि में नहीं मिलता; फिर भी माघ के समान निकट समासान्त पदावली का इनकी कविता में अभाव है। भारवि के अर्थ को समझना कुछ परिश्रमसाध्य है और नारियल के फल की भाँति ऊपर के कठोर आवरण को तोड़ने पर ही काव्य-रस का पान सम्भव है। भारवि की रीति गौड़ी तो नहीं है किन्तु ठीक कालिदास की वैदर्भी भी नहीं है। भारवि ने अपने पाण्डित्य-प्रदर्शन में भी कमी नहीं रखी है। उनका पाण्डित्य-प्रदर्शन ऐसा दोष हो गया है जो उनकी कविता के भावना-पक्ष को दुर्बल बना देता है। अपने व्याकरण-ज्ञान का उन्होंने बराबर प्रदर्शन करने का लोभ किया है और पाणिनि के अनेक सूत्रों के लिये उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने व्याकरण के चक्कर में पड़कर उस प्रवृत्ति को जन्म दिया जो इनके बाद के कवियों—भट्टि, माघ, श्रीहर्ष में अधिक हो चली है।

'तन्' धातु का अत्यधिक प्रयोग कुछ खटकता है और अतीत की घटना का वर्णन करने में भारवि 'परोक्षभूते लिट्' का प्रयोग करते हैं और लङ्-लुङ् का प्रयोग अपरोक्ष भूत के लिये। व्याकरण की त्रुटियाँ भारवि में कम हैं किन्तु 'आजघ्ने' का प्रयोग व्याकरण-संगत नहीं है।

विविध छन्दों के प्रयोग में भारवि सिद्धहस्त हैं। वंशस्थ भारवि का प्रिय छन्द है और अधिक सफल भी वे वंशस्थ में ही हुए हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, द्रुतविलम्बित, प्रमिताक्षरा, प्रहर्षिणी आदि कई छन्दों का प्रयोग किया है। कालिदास के खास छन्द छः हैं, भारवि के बारह तो माघ के सोलह।

भारवि की कविता में गीतिमय माधुर्य की अपेक्षा वर्णनात्मक एवं तर्कात्मक ओज का प्राधान्य है। सुश्लिष्ट पद-विन्यास के आचार्य कालिदास के समान प्रसादमयी हृदयावर्जक पदावली का अस्तित्व इनके महाकाव्य में तो सचमुच नहीं है किन्तु अर्थगौरवमय पदों का विन्यास यहाँ पूर्ण मात्रा में है। भारवि ने जितना लिखा है प्रौढ़ता, अनुभूति एवं भावुकता के साथ लिखा है। संस्कृत काव्य की एक नवीन शैली विचित्रमार्ग की सृष्टि करने के लिये भारवि प्रबन्ध काव्यों के विकास में गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं।'

जैसा कि डॉ० डे ने कहा है—'भारवि की कला प्रायः अत्यधिक अलंकृत नहीं है, किन्तु आकृति-सौष्ठव का नियमितता व्यक्त करती है। शैली दुष्प्राप्य कान्ति भारवि में सर्वथा नहीं है, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा, किन्तु भारवि उसकी व्यंजना अधिक नहीं कराते। भारवि का अर्थगौरव, जिसके लिए विद्वानों ने उनकी अत्यधिक प्रशंसा की है, उनकी गम्भीर अभिव्यंजना शैली का फल है, किन्तु यह अर्थ गौरव एक साथ भारवि की शक्ति तथा दुर्बलता ( भावपक्ष की दुर्बलता ) दोनों को व्यक्त करती है। भारवि की अभिव्यंजना शैली का