किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 707 में से
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परिपार्क अपनी उदात्त स्निग्धता के कारण सुन्दर लगता है, उसमें शब्द तथा अर्थ के सुडौलपन की स्वस्थता है, किन्तु महान् कविता की उस शक्ति की कमी है, जो भावों को स्फूर्ति तथा हृदय को उठाने की उच्चतम क्षमता रखती है।
श्री आर० सी दत्त Civilization of the Ancient India में लिख हैं :—
‘In the richness of a creative fancy, in true tenderness and Pathos, and even in the sweetness of melody of verse, Kalidasa is incomparably a greater poet. But nevertheless Bharavi boasts of a vigour of thought and of language, a spirited and lofty eloquence in expression, which Kalidasa seldom equals.’
निःसन्देह विचारों एवं भाषा की स्फूर्ति एवं उच्चकोटि की अभिव्यक्ति में भारवि कालिदास से भी बढ़ जाते हैं भले ही कल्पना का वैभव, कोमलता, भावुकता एवं गीति-काव्य की मधुरता में महाकवि कालिदास उनसे बहुत आगे हैं।
पण्डितों में यह उक्ति है कि भारवि से माघ बढ़कर है तथा माघ ने भारवि के प्रभाव को कम करने के लिये, उन्हें नीचा दिखाने के लिये अपने काव्य की रचना की थी।
तावद्भा भारवेर्भाति यावन्माघस्य नोदयः ।
उदिते च पुनर्माघे भारवेर्भा रवेरिव ॥
किन्तु माघ के काव्य में अस्वाभाविकता, शुष्कता एवं कृत्रिमता बढ़ ही गई है और उनकी रचना में भारवि का अनुकरण स्पष्ट है।
तृतीय सर्ग कथासार
युधिष्ठिर और अर्जुन के प्रति व्यास की उक्ति
हे राजन् ! संग्राम में उसी की जय होती है जिसके पास सेना तथा अस्त्रादि का विशेष बल है, यह बात परशुराम के साथ युद्ध करने में भीष्म ने उन्हें पराजित करके लोगों को दिखला दी है। और यमराज से भी नहीं डरनेवाले भीष्म तथा कर्ण एवम् प्रलयकालाग्नि के समान युद्ध में भयंकर द्रोणाचार्य आदि योद्धागण सब दुर्योधन के पक्ष में हैं अतः उन सबों को जिनसे जीत सकें उन दिव्य-अस्त्रों को पाने के लिये मैं अर्जुन को एक मन्त्र बतलाता हूँ जिसके द्वारा वे कठिन तपस्या कर इन्द्र भगवान् को प्रसन्न कर दिव्य अस्त्र तथा पराक्रम प्राप्तकर युद्ध में विजयी हों, बस यही मेरे आने का उद्देश्य है, ऐसा कह व्यासजी पुनः अर्जुन से कहने लगे—हे अर्जुन ! तुम अब मेरे कथनानुसार साथ में अस्त्रों को भी लिये हुए मुनियों की भाँति जाकर तपस्या करो, और जहाँ पर