किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
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भारवि की कविता अपनी सर्वोत्तम अवस्था में प्रसादगुण युक्त है। यद्यपि कालिदास के समान प्रसादगुण भारवि में नहीं मिलता; फिर भी माघ के समान निकट समासान्त पदावली का इनकी कविता में अभाव है। भारवि के अर्थ को समझना कुछ परिश्रमसाध्य है और नारियल के फल की भाँति ऊपर के कठोर आवरण को तोड़ने पर ही काव्य-रस का पान सम्भव है। भारवि की रीति गौड़ी तो नहीं है किन्तु ठीक कालिदास की वैदर्भी भी नहीं है। भारवि ने अपने पाण्डित्य-प्रदर्शन में भी कमी नहीं रखी है। उनका पाण्डित्य-प्रदर्शन ऐसा दोष हो गया है जो उनकी कविता के भावना-पक्ष को दुर्बल बना देता है। अपने व्याकरण-ज्ञान का उन्होंने बराबर प्रदर्शन करने का लोभ किया है और पाणिनि के अनेक सूत्रों के लिये उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने व्याकरण के चक्कर में पड़कर उस प्रवृत्ति को जन्म दिया जो इनके बाद के कवियों—भट्टि, माघ, श्रीहर्ष में अधिक हो चली है।
'तन्' धातु का अत्यधिक प्रयोग कुछ खटकता है और अतीत की घटना का वर्णन करने में भारवि 'परोक्षभूते लिट्' का प्रयोग करते हैं और लङ्-लुङ् का प्रयोग अपरोक्ष भूत के लिये। व्याकरण की त्रुटियाँ भारवि में कम हैं किन्तु 'आजघ्ने' का प्रयोग व्याकरण-संगत नहीं है।
विविध छन्दों के प्रयोग में भारवि सिद्धहस्त हैं। वंशस्थ भारवि का प्रिय छन्द है और अधिक सफल भी वे वंशस्थ में ही हुए हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, द्रुतविलम्बित, प्रमिताक्षरा, प्रहर्षिणी आदि कई छन्दों का प्रयोग किया है। कालिदास के खास छन्द छः हैं, भारवि के बारह तो माघ के सोलह।
भारवि की कविता में गीतिमय माधुर्य की अपेक्षा वर्णनात्मक एवं तर्कात्मक ओज का प्राधान्य है। सुश्लिष्ट पद-विन्यास के आचार्य कालिदास के समान प्रसादमयी हृदयावर्जक पदावली का अस्तित्व इनके महाकाव्य में तो सचमुच नहीं है किन्तु अर्थगौरवमय पदों का विन्यास यहाँ पूर्ण मात्रा में है। भारवि ने जितना लिखा है प्रौढ़ता, अनुभूति एवं भावुकता के साथ लिखा है। संस्कृत काव्य की एक नवीन शैली विचित्रमार्ग की सृष्टि करने के लिये भारवि प्रबन्ध काव्यों के विकास में गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं।'
जैसा कि डॉ० डे ने कहा है—'भारवि की कला प्रायः अत्यधिक अलंकृत नहीं है, किन्तु आकृति-सौष्ठव का नियमितता व्यक्त करती है। शैली दुष्प्राप्य कान्ति भारवि में सर्वथा नहीं है, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा, किन्तु भारवि उसकी व्यंजना अधिक नहीं कराते। भारवि का अर्थगौरव, जिसके लिए विद्वानों ने उनकी अत्यधिक प्रशंसा की है, उनकी गम्भीर अभिव्यंजना शैली का फल है, किन्तु यह अर्थ गौरव एक साथ भारवि की शक्ति तथा दुर्बलता ( भावपक्ष की दुर्बलता ) दोनों को व्यक्त करती है। भारवि की अभिव्यंजना शैली का
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परिपार्क अपनी उदात्त स्निग्धता के कारण सुन्दर लगता है, उसमें शब्द तथा अर्थ के सुडौलपन की स्वस्थता है, किन्तु महान् कविता की उस शक्ति की कमी है, जो भावों को स्फूर्ति तथा हृदय को उठाने की उच्चतम क्षमता रखती है।
श्री आर० सी दत्त Civilization of the Ancient India में लिख हैं :—
‘In the richness of a creative fancy, in true tenderness and Pathos, and even in the sweetness of melody of verse, Kalidasa is incomparably a greater poet. But nevertheless Bharavi boasts of a vigour of thought and of language, a spirited and lofty eloquence in expression, which Kalidasa seldom equals.’
निःसन्देह विचारों एवं भाषा की स्फूर्ति एवं उच्चकोटि की अभिव्यक्ति में भारवि कालिदास से भी बढ़ जाते हैं भले ही कल्पना का वैभव, कोमलता, भावुकता एवं गीति-काव्य की मधुरता में महाकवि कालिदास उनसे बहुत आगे हैं।
पण्डितों में यह उक्ति है कि भारवि से माघ बढ़कर है तथा माघ ने भारवि के प्रभाव को कम करने के लिये, उन्हें नीचा दिखाने के लिये अपने काव्य की रचना की थी।
तावद्भा भारवेर्भाति यावन्माघस्य नोदयः ।
उदिते च पुनर्माघे भारवेर्भा रवेरिव ॥
किन्तु माघ के काव्य में अस्वाभाविकता, शुष्कता एवं कृत्रिमता बढ़ ही गई है और उनकी रचना में भारवि का अनुकरण स्पष्ट है।
तृतीय सर्ग कथासार
युधिष्ठिर और अर्जुन के प्रति व्यास की उक्ति
हे राजन् ! संग्राम में उसी की जय होती है जिसके पास सेना तथा अस्त्रादि का विशेष बल है, यह बात परशुराम के साथ युद्ध करने में भीष्म ने उन्हें पराजित करके लोगों को दिखला दी है। और यमराज से भी नहीं डरनेवाले भीष्म तथा कर्ण एवम् प्रलयकालाग्नि के समान युद्ध में भयंकर द्रोणाचार्य आदि योद्धागण सब दुर्योधन के पक्ष में हैं अतः उन सबों को जिनसे जीत सकें उन दिव्य-अस्त्रों को पाने के लिये मैं अर्जुन को एक मन्त्र बतलाता हूँ जिसके द्वारा वे कठिन तपस्या कर इन्द्र भगवान् को प्रसन्न कर दिव्य अस्त्र तथा पराक्रम प्राप्तकर युद्ध में विजयी हों, बस यही मेरे आने का उद्देश्य है, ऐसा कह व्यासजी पुनः अर्जुन से कहने लगे—हे अर्जुन ! तुम अब मेरे कथनानुसार साथ में अस्त्रों को भी लिये हुए मुनियों की भाँति जाकर तपस्या करो, और जहाँ पर
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तपस्या करनी है वहाँ पर यह यक्ष तुम्हें शीघ्र ही पहुँचा देगा ऐसा कहकर जैसे ही व्यास जी अन्तर्धान हुए वैसे ही अर्जुन के पास यक्ष उपस्थित हो गया तब उन्हें जाने के लिये उद्यत देख द्रौपदी अर्जुन से कहने लगी।
अर्जुन के प्रति द्रौपदी की उक्ति
जबतक तपस्या पूरी न हो तबतक आप हमलोगों के बिना व्यग्र न होना क्योंकि बिना दृढ़ आग्रह के कोई सिद्ध नहीं होता और उन्हें तपस्या के लिये उत्तेजित करने के लिये पुनः कहने लगी कि—संसार में तेजस्वी पुरुषों की मान-हानि प्राण-हानि के तुल्य ही होती है, शत्रु से पराजित होने पर उनका अपमान होता है और शत्रुओं ने जो-जो दुर्व्यवहार किये हैं और जिन्हें कि—मैं स्मरण भी नहीं करना चाहती, आज मुझे वे ही सब तुम्हारे बिना यद्यपि और भी कष्ट पहुचायेंगे तथापि उन सबों को इस आशय से सहूँगी कि आप शीघ्र ही शत्रुओं को जीतने योग्य सामर्थ्य प्राप्त कर पुनः मिलेंगे। अतः अब आप तपस्या के लिये जायँ और आपके समस्त विघ्नों को इन्द्र भगवान् दूर करें। हे नाथ ! आप व्यास जी का आदेश पालन करते हुए हमलोगों के मनोरथ को सफल करें। अब आपको कृतकार्य देखकर पुनः आनन्द से आलिङ्गन करना चाहती हूं। तब इन सब बातों को सुनकर अर्जुन को दुर्योधनादिकों के ऊपर अत्यन्त क्रोध हुआ वह कवच पहन-कर तलवार, धनुष और तरकश लेकर यक्ष के बताये हुये रास्ते से इन्द्रकील पर्वत पर तपस्या करने के लिये चल पड़े। उनके जाने पर सब लोगों को अत्यन्त दुःख मालूम पड़ने लगा, पर समझाकर किसी भाँति अपने-अपने चित्त को शांत किया। उस समय मङ्गल-सूचक दिव्य दुन्दुभी शब्द तथा आकाश में पुष्पवर्षा होने लगी जिसे देखकर सब अत्यन्त प्रसन्न हुये।
| व्याख्याता—<br>गोरखपुर विश्वविद्यालय | —उमेशचन्द्र पाण्डेय |
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अथ तृतीयः सर्गः
अथ त्रिभिर्मुनिं विशिषंश्चतुर्भिः कलापकमाह-तदुक्तम्-'द्वाभ्यां युग्ममिति प्रोक्तं त्रिभिः श्लोकैर्विशेषकम् । कलापकं चतुर्भिः स्यात्तदूर्ध्वं कुलकं स्मृतम् ।।' इति—
ततः शरच्चन्द्रकराभिरामैरुत्सर्पिभिः प्रांशुमिवांशुजालैः ।
विभ्राणमानीलरुचं पिशङ्गीर्जटास्तडित्वन्तमिवाम्बुवाहम् ॥ १ ॥
तत इति ॥ तत उपवेशनानन्तरं धर्मात्मजो युधिष्ठिरः। शरच्चन्द्रकराभिरामैः। आह्लादकैरित्यर्थः। उत्सर्पिभिरूर्ध्वं प्रसारिभिरंशुजालैः प्रांशुमुन्नतमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा । पुनरानीलरुचं कृष्णवर्णं पिशङ्गीः पिङ्गलवर्णाः गौरादित्वान्ङीष् । जटाः विभ्राणं धारयन्तमत एव तडित्वन्तं विद्युद्युक्तमम्बुवाहमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा ॥१॥
अन्वयः—ततः शरच्चन्द्रकराभिरामैः, उत्सर्पिभिः, अंशुजालैः प्रांशुम इव, आनीलरुचम्, पिशङ्गीः, जटाः, विभ्राणं (तं) तडित्वन्तम्, अम्बुवाहम् इव स्थितं युधिष्ठिरं आवभाषे) इति चतुर्थश्लोकेन सम्बन्धः ॥ १ ॥
व्याख्या—ततः = उपवेशनानन्तरम्, शरच्चन्द्रकराभिरामैः = शरदृतुकचन्द्रकिरणवन्मनोहरैः, उत्सर्पिभिः, उपरि प्रसरणशीलैरिति यावत्। अंशुजालैः=किरणसमूहैः, प्रांशुम् = उन्नतम्, इव स्थितम्, पुनः आनीलरुचं = कृष्णवर्णम्, पिशङ्गीः = पीतवर्णाः, जटाः = संयमितकेशविशेषाः, विभ्राणं = दधानं, तं व्यासं, तडित्वन्तं=विद्युत्सन्वितम्, अम्बुवाहं = जलधरम्, मेघमिवेति यावत्। वर्तमानं युधिष्ठिरः, आवभाषे=उवाच ॥ १ ॥
समासः--शरदः (आश्विनकार्तिकयोः) यश्चन्द्रः, स शरच्चन्द्रः, तस्य ये करास्ते शरच्चन्द्रकरास्त इव अभिरामा यैः तैः शरच्चन्द्रकराभिरामैः। अंशूनां जालानि, तैरंशुजालैः। आ समन्ताद्भावेन नीला रुग् यस्य तमानीलरुचम्, अम्बूनि वहतीति अम्बुवाहः ॥ १ ॥
व्याक०—विभ्राणम्=भृ + लट् + शानच् । उत्सर्पिभिः=उत् + सृप् + णिनिः ॥
वाक्यान्तरम्—शरच्चन्द्रकराभिरामैरंशुजालैः प्रांशुरिव स्थितिः आनीलरुक् पिशङ्गी जटा विभ्राणो व्यासः तडित्वान् अम्बुवाह इव युधिष्ठिरेणावभाषे ॥ १ ॥
कोषः—'सुन्दरो रुचिरश्चारुरभिरामो मनोहर' इति कोषः । 'स्युः प्रभा रुग्रुचिस्त्विट्भाभाश्छविद्युतिदीप्तय' इत्यमरः । 'अभ्रं मेघो वारिवाहः स्तनयित्नुर्बलाहक' इत्यमरः ॥ १ ॥
२ कि० तृ०
| २ | किरातार्जुनीयम् | [ तृतीयः |
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सारार्थः— व्यासयुधिष्ठिरयोरुपवेशनानन्तरं शारदीयपूर्णचन्द्रकिरणनिकरमिव किरणं धारयन्। यथा विद्युत्वान् मेघो भवति तथा स्वयं कृष्णवर्णः पीतवर्णं जटाजूटं बिभ्राणो व्यासो युधिष्ठिरेण सादरं पृष्ट इति ॥ १ ॥
भाषार्थः— बैठने के बाद शरद् ऋतु की किरणों जैसे मनोहर और ऊपर फैलते हुए किरण-पुञ्जों से एक उच्च बेर के जैसे बैठे और खुद श्यामवर्ण, पीले रंग की जटाओं को धारण किये हुये जैसे बिजुली से शोभित बादल हो, वैसे बैठे व्यासजी से महाराज युधिष्ठिर बोले ॥ १ ॥
प्रसादलक्ष्मीं दधतं समग्रां वपुःप्रकर्षेण जनातिगेन।
प्रसह्य चेतःसु समासजन्तमसंस्तुतानामपि भावमार्द्रम् ॥ २ ॥
प्रसादेति ॥ पुनः समग्रां सम्पूर्णां प्रसादः सौम्यता तस्य लक्ष्मीं सम्पदं दधतम्। अत एव जनमतिगच्छतीति जनातिगेन लोकातिशायिना। 'अन्येष्वपि दृश्यते' इति डप्रत्ययः। वपुःप्रकर्षेणाकारसम्पदाऽसंस्तुतानामपरिचितानामपि। व्यासो ऽयमित्य-जानतामपीत्यर्थः। 'संस्तवः स्यात्परिचयः' इत्यमरः। चेतःसु चित्तेष्वाद्रं स्नेहार्द्रं भावमभिप्रायं प्रसह्य बलात्समासजन्तम्। लगयन्तमिति यावत्। 'दंशरञ्जस्वञ्जां शपि इत्युपधाया लोपः। प्रसन्नाकारेषु सर्वोऽपि स्निह्यतीति भावः ॥ २ ॥
अन्वयः— समग्रां प्रसादलक्ष्मीं दधतं, जनातिगेन वपुःप्रकर्षेण, असंस्तुतानाम्, अपि चेतःसु आर्द्रंभावं प्रसह्य समासजन्तम् ( व्यासं युधिष्ठिरम् आवभाषे ) इति चतुर्थश्लोकेन सङ्गतिः ॥ २ ॥
व्याख्या— समग्रां = सकलाम् ; प्रसादलक्ष्मीं = सौम्यत्वशोभां, दधतं = दधानं, जनातिगेन=लोकातिगेन, वपुःप्रकर्षेण=शरीरोत्कर्षेण, असंस्तुतानाम् = अपरिचिता-नाम्, अपि, जनानामिति शेषः, चेतःसु, = मनःसु, आर्द्रं = प्रेमरसपूर्णम् , भावम्=अभिप्रायम्, प्रसह्य = बलात्, समासजन्तं = योजयन्तं, तं व्यासं युधिष्ठिर उवा-चेति शेषः। अर्थात् परिचितं जनं दृष्ट्वा साधारणस्य स्नेहार्द्रो भावः उत्पद्यते, अपरिचितं विलोक्य यावदालापो न भवति तावन्मिथः सम्पुटितमिव मुखं, कीलि-तमिव मनः, उदासीने नयने, एवं भवति, परन्तु, इदं सामान्यस्य लक्षणम्। परिचितमपि जनमपरिचितवदौदासीन्यं दर्शयतीति, अधमस्य लक्षणम्! तथा-ऽपरिचितमपि जनमालोक्याकारणं मनः प्रेमपूर्णं परिचितवद् यस्य भवति, तदु-दारचरितस्य लक्ष्म, यद् व्यासस्योचितमेवेति किं चित्रम् ? ॥ २ ॥
समासः— प्रसादस्य लक्ष्मीः प्रसादलक्ष्मीस्तां प्रसादलक्ष्मीम् ! वपुषः प्रकर्षः वपुःप्रकर्षस्तेन वपुःप्रकर्षेण। अति गच्छतीति अतिगः, जनेभ्योऽतिगः जनातिग-स्तेन जनातिगेन, न संस्तुता असंस्तुतास्तेषामसंस्तुतानाम् ॥ २ ॥
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ३
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ३
**व्याक०—**दधतं=दध + शतृ । समासञ्जयन्तम्=सम् + आ + सञ्ज् + लट् + शतृ ॥
**वाच्यान्तरम्—**समग्रा, प्रसादलक्ष्मीं दधद् जनातिगेन वपुःप्रकर्षेणासंस्तुताना-
मति चेतःस्वादं भावं समासञ्जन् ( व्यासः युधिष्ठिरेण पृष्ट इति ) ॥ २ ॥
कोषः—'प्रसादस्तु प्रसन्नता' इत्यमरः । 'समग्रं सकलं पूर्णमखण्डं स्यादनूनके'
इत्यमरः । 'असंस्तुतोऽपरिचित' इति कोषः ॥ २ ॥
**सारार्थः—**सकलप्रसन्नतापरिपूर्णम् , अपरिचितजनेष्वपि प्रेमपूर्णं भावं प्रदर्श-
यन्तं व्यासं युधिष्ठिर उवाचेति ॥ २ ॥
**भाषार्थः—**पूरी प्रसन्नता को दर्शाते हुए, सकल-लोकाधिक देह की कान्ति से
अनजान लोगों के दिलों में भी प्रेमरस के गीले भाव को उपजाते हुए व्यास से
युधिष्ठिर बोले ॥ २ ॥
अनुद्धताकारतया विविक्तां तन्वन्तमन्तःकरणस्य वृत्तिम् ।
माधुर्यविस्रम्भविशेषभाजा कृतोपसम्भावमिवेक्षितेन ॥ ३ ॥
अनुद्धतेति ॥ पुनरनुद्धताकारतया शान्ताकारत्वेन लिङ्गेनान्तःकरणस्य वृत्तिं
विविक्तां पूताम् । शान्तामिति यावत् । 'विविक्तौ' पूतविजनौ' इत्यमरः । तन्वन्तं
प्रकटयन्तम् । आकृतिरेवास्य चित्तशुद्धिं कथयेतीत्यर्थः । पुनर्माधुर्यं निसर्गसौम्यता
विस्रम्भो विश्वासः । 'समौ विस्रम्भविश्वासौ' इत्यमरः । तयोर्विशेषमतिशयं
भजतीति यथोक्तेनेक्षितेन दर्शनेनैव कृतोपसम्भाषा सम्भाषणं येन तमिवेत्युत्प्रेक्षा ।
दृष्टिविशेषेणैवोपसम्भाष्यमाणमिव स्थितमित्यर्थः, काशिकायां तु 'उपसम्भाषणमुप-
सान्त्वनम्' इति भासनादिसूत्रे ॥ ३ ॥
**अन्वयः—**अनुद्धताकारतया, अन्तःकरणस्य विविक्तां वृत्तिः तन्वन्तम्, माधुर्य-
विस्रम्भविशेषभाजा, ईक्षितेन कृतोपसम्भाषम् , इव ( स्थितं व्यासं युधिष्ठिर आव-
भाषे ) ॥ ३ ॥
**व्याख्या—**अनुद्धतया = अतिनम्रचेष्टया, अन्तःकरणस्य = हृदयस्य, विविक्तां =
स्पष्टाम् , अगोपितामित्यर्थः । वा, विविक्ताम् = पवित्रां, निर्मलामित्यर्थः । वृत्तिं=
चित्तचेष्टां, तन्वन्तम् = प्रकाशयन्तम् , माधुर्यविस्रम्भविशेषभाजा = सौम्यत्व-
विश्वासयुक्तेन, ईक्षितेन = अवलोकनेन, कृतोपसम्भाषं = कृतालापम् , इव स्थितं,
व्यासं युधिष्ठिर उवाचेति शेषः ॥ ३ ॥
**समासः—**न उद्धतोऽनुद्धत आकार इत्यनुद्धताकारस्तस्य भावस्तत्ता, इत्यनु-
द्धताकारता तयाऽनुद्धताकारतया, मधुरस्य भावो माधुर्यम् , माधुर्यं, च विस्रम्भश्च
माधुर्यविस्रम्भौ तयोर्यो विशेषः स माधुर्यविस्रम्भविशेषस्तं भजतीति माधुर्य-
विस्रम्भविशेषभाक् तेन माधुर्यविस्रम्भविशेषभाजा । कृता उपसम्भाषा येन सः, तं
कृतोपसम्भाषम् ॥ ३ ॥
| ४ | किरातार्जुनीयम् | [ तृतीयः |
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व्याकरणम्—तन्वन्तम् = तनु + शतृ ॥ ३ ॥
वाच्यान्तरम्—अनुद्भूताकारतयाऽन्तःकरणस्य विविक्तां वृत्तिं तन्वन्, माधुर्यं विश्रम्भविशेषभाजा, ईक्षितेन कृतोपसम्भाष इव स्थितो व्यासो युधिष्ठिरेण पृष्टः॥
कोषः—'विविक्तौ पूतविजनौ' इत्यमरः । 'आजीवो जीविका वार्ता वृत्तिर्वर्त्तनजीवने' इत्यमरः । "समो विश्रम्भविश्वासौ" इत्यमरः । 'दर्शनालोकनेक्षितम्' इत्यमरः ।
सारार्थः—अतिसरलप्रवृत्त्याऽन्तर्गतमपि भावं प्रकाशयन् परमसोम्यविश्वासप्रकाशकेनावलोकनेन यथाऽन्योन्यं वार्त्ता क्रियते, तथैव लक्षितं व्यासं युधिष्ठिर उवाचेति ॥ ३ ॥
भाषार्थः—बिल्कुल सीधे-सादे स्वरूप से दिल के भाव को दर्शाते और सौम्यता तथा विश्वास से भरी आँखों से जैसे एक दूसरे से बातचीत करे, वैसे बैठे व्यास से युधिष्ठिर बोले ॥ ३ ॥
धर्मात्मजो धर्मनिबन्धिनीनां प्रसूतिमेनःप्रणुदां श्रुतीनाम् ।
हेतुं तदभ्यागमने परीप्सुः सुखोपविष्टं मुनिमावभाषे ॥ ४ ॥
धर्मेति ॥ पुनर्धर्मं निबन्धन्तीति धर्मनिबन्धिनीनामग्निहोत्रादिधर्मप्रतिपादिकानाम् । एनःप्रणुदामघच्छिदाम् । क्विप् । श्रुतीनां वेदानाम् । 'श्रुतिः स्त्री वेद आम्नायः' इत्यमरः । प्रसूतिं प्रभवं सुखोपविष्टं मुनिं तदभ्यागमने तस्य मुनेरागमने हेतुं, परीप्सुर्जिज्ञासुः । आप्नोतेः सन्नन्तादुप्रत्ययः 'आपज्ज्ञप्सृधामीत्' इतीकारः । 'अत्र लोपोऽभ्यासस्य' इत्यभ्यासलोपः । आवभाषे उवाच ॥ ४ ॥
अन्वयः—तदभ्यागमने हेतुं परीप्सुः, धर्मात्मजः, धर्मनिबन्धिनीनाम्, एनःप्रणुदां, श्रुतीनाम् प्रसूतिं, सुखोपविष्टं मुनिम् , आवभाषे ॥ ४ ॥
व्याख्या—तदभ्यागमने = व्यासागमने, हेतुं = कारणं, किमर्थं निरीहोऽपि भवानकिञ्चित्करस्य ममाश्रये यात्रा कृतेतिरूपमित्यर्थः । परीप्सुः = जिज्ञासुः, धर्मात्मजः = धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः, ( कर्त्ता ), धर्मनिबन्धिनीनाम्, धर्मविषयकाणाम् एनःप्रणुदाम् = पापोच्छेदिकानां, श्रुतीनां = वेदानाम् , प्रसूतिं = जनकं, वेदान्तसूत्रादेर्निर्मातृत्वात् सुखोपविष्टं = सुप्रसन्नासीनम्, मुनिं = व्यासम्, आवभाषे = उवाचेति ॥
समासः—धर्मस्यात्मजो धर्मात्मजः । धर्मान्निबध्नन्तीति धर्मनिबन्धिन्यः, तासां धर्मनिबन्धिनीनाम् । एनांसि प्रणुदन्ति यास्ता एनः प्रणुदस्तासामेनःप्रणुदाम् । तस्य अभ्यागमनं तस्मिन् तदभ्यागमने । सुखेन उपविष्टः सुखोपविष्टस्तं सुखोपविष्टम् ॥
व्याक०—परीप्सुः=परि + आप् + सन् + उः । आवभाषे=आ + भाष + लिट् ।
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ५
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ५
वाच्यान्तरम्—तदभ्यागमने हेतुं परीप्सुना धर्मराजेन धर्मनिबन्धिनीनामेनः प्रणुदां श्रुतीनां प्रसूतिः सुखोपविष्टो मुनिरावभाषे ॥ ४ ॥ कोषः—'कलुषं वृजिनेनोऽघम्' इत्यमरः । 'श्रुतिर्वेदे च कर्णे च' इति कोषः । 'हेतुर्ना कारणं बीजं निदानं त्वादिकारणम्'—इत्यमरः ॥ ४ ॥ भावार्थः—व्यासागमनप्रयोजनज्ञानाय युधिष्ठिरो वेदविभागविधातारं व्यासं प्रत्युवाच ॥ ४ ॥ भाषार्थः—उन (व्यास) के आने के बारे में कारण पूछने की इच्छावाले महाराज युधिष्ठिर, धर्मसम्बन्ध पापनाशक, वेदों के उत्पादक, आराम-चैन से बैठे हुए, उन व्यास जी से बोले ॥ ४ ॥
अनाप्तपुण्योपचयैर्दुरापा फलस्य निर्धूतरजाः सवित्री । तुल्या भवद्दर्शनसम्पदेषा वृष्टेर्दिवो वीतबलाहकायाः ॥ ५ ॥
अनाप्तेति ॥ अनाप्तपुण्योपचयैरकृतपुण्यसंग्रहैर्दुरापा दुर्लभा । फलस्य सवित्री श्रेयस्करी निर्धूतरजा हतरजोगुणा । अन्यत्र निरस्तधूलिः । 'रजो रजोगुणे धूलौ परागातंर्वयोरपि' इति शाश्वतः । एषा भवद्दर्शनसम्पत्सम्पत्तिः । लाभ इति यावत् । सम्पदादिभ्यः क्विपो भावार्थत्वात् । वीतबलाहकायाः । गतमेघाया दिव आकाशस्य सम्बन्धिन्या वृष्टेस्तुल्येत्युपमाऽलङ्कारः अनभ्रवृष्टिवदतर्कितोपपन्नं भवद्दर्शनं सर्वथा कस्यचिच्छ्रेयसो निदानमित्यर्थः वारि वहतीति बलाहकः । पृषोदरादित्वात्साधुः ॥ अन्वयः—अनाप्तपुण्योपचयैः, दुरापा, फलस्य सवित्री, निर्धूतरजाः, एषा भव- द्दर्शनसम्पत् , वीतबलाहकायाः, दिवः, वृष्टेः, तुल्या ॥ ५ ॥ व्याख्या—अनाप्तपुण्योपचयैः—अप्राप्तपुण्यसमूहैः, अकृतसुकृतनिचयैरित्यर्थः । जनैरिति शेषः । दुरापा = दुर्लभा । फलस्य = मनोरथस्य, सवित्री = जननी, अभीष्ट- कल्याणकारिणी । निर्धूतरजाः = निरस्तरजोगुणा, सात्त्विकीति भावः । एषा = इयम् , आधुनिकीति भावः । भवद्दर्शनसम्पत् = स्वदवलोकन सम्पत्तिः, वृष्टिपक्षे, अनाप्तपुण्योपचयैः = अकृतधर्मैः, कृषकैः, दुरापा = दुष्प्राप्या, फलस्य = सस्यस्य, सवित्री = निदानरूपा, उत्पादयित्री । निर्धूतरजाः = हतधूलिः, वीतबलाहकायाः = विगतमेघायाः, दिवः = आकाशस्य, वृष्टेः = वर्षायाः, तुल्या = समा अर्थात् वृष्टि- र्भवतु न वा, किन्तु नभसि वारिदे आयाते 'वृष्टिसम्भवो लोकैरुच्यते परमाकाशे मेघं दृष्ट्वा सर्वथा वृष्टेरसम्भवो ज्ञायते लोकैः, तदानीं च जलवर्षणं भवति, तदत- र्कितं तथा, तथैव हतभाग्येऽपि मयि परमभाग्यवल्लोक इव स्वकृपादृष्टिवृष्टिर्विहिता भवतेति ॥ ५ ॥ समासः—पुण्यानामुपचयाः पुण्योपचयाः न आप्ताः पुण्योपचया यैस्तैरनाप्त- पुण्योपचयैः । दुःखेनवाप्यत इति दुरापा, निर्धूतं रजो यया सा निर्धूतरजाः ।
६ | किरातार्जुनीयम् | [ तृतीयः
वीता गता बलाहका यस्यां सा वीतबलाहका, तस्या वीतबलाहकायाः ॥ ५ ॥
व्याकरणम्—सवित्री = सवितृ + ङीप् ॥ ५ ॥
वाच्यान्तरम्—अनाप्तपुण्योपचयैर्दुरापया फलस्य सवित्र्या, निर्धूतराजसाऽतया भवद्दर्शनसम्पदा वीतबलाहकाया दिवो वृष्टेस्तुल्यया भूयते ॥ ५ ॥
कोषः—'स्याद्धर्ममस्त्रियां पुण्यश्रेयसी सुकृतं वृष' इत्यमरः । 'वृष्टिर्वर्षम्' इत्यमरः । 'द्योदिवौ द्वे स्त्रियामभ्रं व्योमपुष्करमम्बरम्' इत्यमरः । अभ्रंमेघोवारिवाहः स्तनयित्नुर्बलाहक' इत्यमरः ॥ ५ ॥
सारार्थः—अनुपार्जितधर्मैर्जनैर्दुर्लभं सकलकल्याणकरं पापध्वंसकं भवद्दर्शनमकस्माद्, हतभाग्यस्य मम तथा सञ्जातं यथा निर्मेघादाकाशाज्जलवर्षणं विलोक्य जना हर्षोत्फुल्लनयना भूत्वा साश्चर्यमवलोकयन्तीति ॥ ५ ॥
भाषार्थः—नहीं किया है पुण्यों का संग्रह जिन लोगों ने, उनसे दुर्लभ और मनोरथ को पूरा करनेवाली, पापनाशिनी, आपकी दर्शनरूपिणी लक्ष्मी, बिना बादल के आकाश की वर्षा के समान है ॥ ५ ॥
अद्य क्रियाः कामदुघाः क्रतूनां सत्याशिषः सम्प्रति भूमिदेवाः ।
आ संसृतेरस्मि जगत्सु जातस्त्वय्यागते यद्बहुमानपात्रम् ॥ ६ ॥
अद्येति ॥ अद्य क्रतूनां क्रिया अनुष्ठानानि । कामान् दुहन्तीति कामदुघाः । फलदा इत्यर्थः । 'दुहः कप्घश्च' इति कप्प्रत्ययो घादेशश्च । सम्प्रत्यद्य भूमिदेवाः ब्राह्मणाः । 'द्विजाग्रजन्मभूदेववाडवाः' । 'विप्रश्च ब्राह्मणः' इत्यमरः । सत्याशिषो जाता। ब्राह्मणाशिषोऽद्य फलिता इत्यर्थः । यद्यतः कारणात्त्वय्यागते सति । त्वदागमनेन निमित्तेनेत्यर्थः अस्मीत्यहमर्थेऽव्ययन् । 'अस्मीत्यस्मदर्थानुवादेऽहमर्थेऽपि' इति गतव्याख्याने । 'दासे कृतगासि भवत्युदितः प्रभूणां पादप्रहार इति सुन्दरि नास्मि दूये' इति प्रयोगाच्च । आ संसृतेरा संसारात्, यावत्संसारमित्यर्थः । अभिविधावाङ् विकल्पाइसमासः । जगत्सु बहुमानपात्रं बहुयोग्यताभाजनं जातः । सकलसत्कर्मफलभूतं त्वदागमनं येन मे जगन्मान्यतेति भावः ॥ ६ ॥
अन्वयः—अद्य क्रतूनां क्रियाः कामदुघा सम्प्रति भूमिदेवाः सत्याशिषः (जाताः) यत् त्वयि, आगते, आ संसृतेः जगत्सु बहुमानपात्रं जातः अस्मि ॥ ६ ॥
व्याख्या—अद्य = अस्मिन् दिने, क्रतूनां = यज्ञानां, क्रियाः = कारणानि, कामदुघाः = इष्टपूर्तिकराः, जाता इति शेषः । इतः कालात्पूर्वं यज्ञानां फलं मम विपरीतः वनवासादिरूपमेव जातम्, इति मम सानुरोधोऽनुभव आसीदधुना भवद्दर्शननिसाधारणाऽपगता, अवश्यं कदाऽपि पुण्यफलं शुभं भवेत्येवेति निश्चय उत्पन्नो मम मनसीति भावः । तथा च सम्प्रति = वर्तमानसमये, इदानीमित्यर्थः । भूमिदेवाः =
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ७
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ७
ब्राह्मणाः, सत्याशिषः = सत्याशीर्वादाः अमिथ्याशुभबचनाः, जाता इति शेषः। यद् = यस्मात्, त्वयि = भवति, व्यासः इत्यर्थः। आगते = समागते, ममाश्रयं प्रत्युपस्थिते सतीत्यर्थः असंसृतेः = सृष्ट्यादितः जगत्सु = संसारेषु बहुमानपात्रम् = परमसत्कारभाजनं, जातः = जनितः, अस्मि, अहमिति शेषः। बहुहुभिः पुण्यैरपि दुर्लभं तन्मम समजनि, अतोऽद्य मत्तोऽधिकभाग्यवान् कोऽप्यन्य इति भावः ॥६॥
समास—कामान् दुहन्ति यास्ताः कामदुघा। सत्या आशिषे येषां ते सत्याशिषः। भूमौ ये देवास्ते भूमिदेवाः। बहुः मानः तस्य पात्रमिति बाहुमानपात्रम् ॥ ६ ॥
व्याकरणम्—अस्मि = अस् + लट् + जातः = जन् + क्तः ॥ ६ ॥
वाच्यान्तरम्—अद्य क्रतूनां क्रियाभिः कामदुघाभिर्भूयते। सम्प्रति भूमिदेवैः सत्याशीर्भिर्भूयते। यत् त्वय्यागते मया बहुमानपात्रेण जातम् ॥ ६ ॥
कोषः—'यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः' इत्यमरः। 'एतर्हि सम्प्रतीदानीमधुना साम्प्रतम्' इत्यमरः। 'द्विजात्यग्रजन्म-भूदेव-वाडवाः। विप्रः ब्राह्मणोऽसौ' इत्यमरः ॥ ६ ॥
सारार्थः—अस्मात्कालात्पूर्वमहं यज्ञस्यापि फलं न किमपि शुभमेव ऽन्वति। नहि ब्राह्मणस्य वचनानि (भवन्तोऽतीव भाग्यवन्तो भविष्यथ एवं) न सत्यत्वेन भवन्तीति दुःखावसरे धारणाऽऽसीत् परन्तु साम्प्रतं मन्ये, सृष्ट्यादितो मत्समोऽन्यो न कोऽपि भाग्यवान् जातः, यतोऽतर्कितं दुर्लभं भवद्दर्शनमनायासेन समासादितम्, अतो मन्ये च पूर्वविहितयज्ञानुष्ठानफलोदयोऽद्यैव, ब्राह्मणानामाशीर्वादा अप्यद्यैव सफला जाता इत्यादि ॥ ६ ॥
भावार्थः—आज ही मेरे पहले के किये हुए यज्ञ सफल हुए, इस समय ब्राह्मणों के आशीर्वाद सत्य सिद्ध हुए, क्योंकि जब से संसार शुरू हुआ, तब से इस दुनियाँ में मेरे समान दूसरा कोई नहीं, ऐसा मैं आपके आने से परम-सत्कार-भाजन हुआ ॥ ६ ॥
श्रियं विकर्षत्यपहन्त्यघानि श्रेयः परिस्रौति तनोति कीर्तिम्।
संदर्शनं लोकगुरोरमोघं तावात्मयोनेरिव किं न धत्ते ॥ ७ ॥
श्रियमिति ॥ आत्मयोनेर्ब्रह्मण इव लोकगुरोस्तवामोघमविफलं संदर्शनं श्रियं विकर्षत्याकर्षति। अघानि दुःखान्यपहन्ति। 'अंहो दुःखव्यसनेष्वघम्' इत्यमरः। श्रेयः पुरुषार्थं परिस्रौति स्रवति। किर्तिं च तनोति। किं बहुना किं न धत्ते किं न करोति। सर्वं करोतीत्यर्थः ॥ ७ ॥
८ किरातार्जुननीयम् . [ तृतीयः
अन्वयः—लोकगुरोः, तव, अमोघं सन्दर्शनम् , आत्मयोनेः ( दर्शनम् ) इव, श्रियं, विकर्षति, अघानि, अपहन्ति, श्रेयः परिस्रौति, कीर्तिं तनोति, किं न धत्ते ॥७॥
व्याख्या—लोकगुरोः=संसारोपदेशकस्य, तव=भवतः, व्यासस्येत्यर्थः । अमोघम् = अव्यर्थं, सफलमित्यर्थः । दर्शनम्=अवलोकनं ( कर्तृ ) । आत्मयोनेः=ब्रह्मणः, दर्शनमिव, श्रियं = सम्पत्तिम्, विकर्षति = आकर्षति, गतामपि राज्यलक्ष्मीं पुनरावर्तयतीति भावः । अघानि = पापानि, अपहन्ति = नाशयन्ति, श्रेयः = कल्याणं, परिस्रौति = स्रवति, कीर्ति = यशः, ख्यातिं, तनोति = विस्तारयति, एवं किं न धत्ते, सर्वं ददातीत्यर्थः ॥ ७ ॥
समासः—लोकस्य भुवनस्य गुरुर्लोकगुरुस्तस्य लोकगुरोः । न मोघमित्यमोघम्, आत्मा एव योनिरुत्पत्तिस्थानं यस्य स आत्मयोनिस्तस्यात्मयोनेः ॥ ७ ॥
व्याकरणम्—विकर्षति = वि + कृष् + लट् । अपहन्ति = अप + हन् + लट् । तनोति = तनु + लट् । परिस्रौति = परि + स्रु + लट् । धत्ते = धा + लट् ॥ ७ ॥
वाच्यान्तरम्—आत्मयोनेरिव लोकगुरोस्तव सन्दर्शनेन श्रियो विकृष्यन्ते, अघान्यपहन्यन्ते, श्रेयः परिस्रूयते, किं न धीयते ॥ ७ ॥
कोषः—'लक्ष्मीः पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिप्रिया' इत्यमरः । 'कलुषं वृजिनैनाऽघमंहो दुरितदुष्कृतम्' इत्यमरः । 'यशः कीर्तिः समज्ञा च' इत्यमरः । 'लोकस्तु भुवने जने' इति कोषः । 'ब्रह्माऽत्मभूः सुरज्येष्ठः परमेष्ठी पितामह' इत्यमरः ॥ ७ ॥
सारार्थः—इह जगति तद्वस्तु विद्यत एव न हि यन्न सम्पादयति भवतां संदर्शनं, सर्वमलभ्यमसाध्यमंशं मनोरथं पूरयतीति ॥ ७ ॥
भाषार्थः—ब्रह्मा के समान आपका दर्शन, गयी हुई लक्ष्मी को भी लौटाता है और पापों का नाश करता है । कल्याण (भलाई) करता है । यश फैलाता है और क्या-क्या नहीं देता ? अर्थात् सब कुछ देता है ॥ ७ ॥
श्च्योतन्मयूखेऽपि हिमद्युतौ मे न निर्वृतं निर्वृतिमेति चक्षुः । समुज्झितज्ञातिवियोगखेदं त्वत्संनिधावुच्छसतीव चेतः ॥ ८ ॥
श्च्योतदिति ॥ हे भगवन् , श्च्योतन्मयूखे सुधास्राविकारे हिमद्युताविन्दावपि विषये न निर्वृतम् । नञर्थस्य नञ्शब्दस्य सुप्सुपेति समासः । मे चक्षुस्त्वत्सन्निधौ निर्वृतिं सुखमेति । तथा चेतश्च समुज्झितज्ञातिवियोगखेदं त्यक्तबन्धुविरहदुःखं समुच्छ्वसतीवानुरोधेन प्राणितीवेत्युत्प्रेक्षा । पूर्वार्धे तु निर्वृत्तिकारणे सत्यपीवाद्यनिर्वृत्तिकथनाद्विशेषोक्तिः । तदुक्तम्—'ततसामग्रयामनिर्वृत्तिर्विशेषोक्तिर्निगद्यते' इति ॥ ८ ॥
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ३
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अन्वय—श्च्योतन्मयूखे, हिमद्युतौ, अपि न निर्वृतं मे चक्षुः, त्वत्सन्निधौ निर्वृत्तिम्, एति समुज्झितज्ञातिवियोगखेदम् (मे) चेतः, उच्छ्वसिति, इव ॥ ८ ॥
व्याख्या—श्च्योतन्मयूखे = पीयूषपूरस्त्राविकिरणो, हिमद्युतौ = चन्द्रे, अपि, न निर्वृतम् अशान्तम्, मे = मम, युधिष्ठिरस्येत्यर्थः । चक्षुः = नयनं, त्वत्सन्निधौ = भवत्समीपे, निर्वृत्ति = शान्तिम्, एति = गच्छति, अमृतवर्षिकिरणस्यापि चन्द्रस्य दर्शनेन न तथा नेत्रं शीतलम् जातं, यथा भवत्सौम्यशरीरदर्शनेनेति भावः अत्राय-माशयः । बाह्यं दुखं बाह्योपचारेण दूरीभवितुमर्हति न हि आन्तरिकं तेन, किन्तु आन्तरिकमान्तरिकोपचारेणैव, यथान्तर्दाहः शीतलजलपानादिना, न हि बहि-श्चन्दनलेपनेन, तद्वत् ममान्तःकरणजनिता व्यथा तु हृदयाह्लादकेन त्वद्दर्शनेनैव दूरी-भूता, न हि नयनाह्लादकचन्द्रकिरणेनेति, तद्युक्तमेवेति, समुज्झितज्ञातिवियोगखेदं=त्यक्तबान्धवविच्छेदखिन्नम्, प्रसन्नमित्यर्थः । मम चेतः = चित्तं, त्वत्सन्निधौ, उच्छ्र-सिति=ऊर्ध्वोच्छ्वासं गृह्णाति । अर्थात् रे दुःख ! अधुना तव कः प्रभावः ! जितमस्म-दुदितभाग्येन, नातः परमागन्तुं शक्नोषि अस्मदन्तिके, मम भाग्योदयकरोऽयं महात्मा, एवं पुनरागमिव्यति तदा पुनःपुनस्त्वं ताडितं भविष्यसि । अतोऽयं शिवस्ते मार्गः यन्न कदापि निश्चितप्राणहरे मयि समागन्तव्यम् ॥ ८ ॥
समासः—श्च्योतन्तो मयूखा यस्य स श्च्योतन्मयूखस्तस्मिन् श्च्योतन्मयूखे । हिमा हिमजननी द्युतिर्यस्य स हिमद्युतिस्तस्मिन् हिमद्युतौ । ज्ञातीनां वियोगः ज्ञातिवियोगः, ज्ञातिवियोगेन यः खेद स ज्ञातिवियोगखेदः, समुज्झितो ज्ञाति-वियोगखेदो येन तत् समुज्झितज्ञातिवियोगखेदम् ॥ ८ ॥
व्याकरणम्—निर्वृतम = निर् + वृ + क्तः । एति = इण् + लट् । उच्छ्वसिति = उद् = श्वस् + लट् ॥ ८ ॥
वाच्यान्तरम्—श्च्योतन्मयूखेऽपि हिमद्युतौ न निर्वृतेन मे चक्षुषा त्वत्सन्निधौ निर्वृत्तिरीयते । समुज्झितज्ञातिवियोगखेदेन मे चेतसोच्छ्वस्येते ॥ ८ ॥
कोषः—'किरणोस्रमयूखांशुगभस्तिघृणिरश्मयः' इत्यमरः । 'हिमाशुश्चन्द्रमाश्चन्द्र इन्दुः कुमुदबान्धव' इत्यमरः ॥ 'लोचनं नयनं नेत्रमीक्षणं चक्षुरक्षिणी' इत्यमरः । 'सगोत्रबान्धवा' इत्यमरः ॥ ८ ॥
साराथ॑ः—परमाह्लादकमप्यमृतकिरणं चन्द्रं विलोक्य यन्मम नयनं न शीतलं जातं, तदधुनाऽऽकस्मिकभवद्दर्शनेन शीतलं पूतं च जातं, तथा चाधुना बन्धुविरह-व्यथां परित्यज्य मम मनस्त्वत्समीपे सुखान्वितं भवतीति ॥ ८ ॥
भाषार्थः--अमृत बनानेवाली किरणें हैं जिसकी, ऐसे चन्द्रमा को भी देखकर जो ठण्डी नहीं हुई, ऐसी मेरी आँख आपको देखकर ठण्डी होती हैं और बन्धुओं
| १० | किरातार्जुनीयम् | [ तृतीयः |
|---|
के बिछुड़ने के दुःख को छोड़कर अभी मेरा शरीर आपके निकट साँस ( उच्छ्वास ) लेता है ॥ ८ ॥
निरास्पदं प्रश्नकुतूहलित्वमस्मास्वधीनं किमु निःस्पृहाणाम् ।
तथाऽपि कल्याणकरीं गिरं ते मां श्रोतुमिच्छा मुखरीकरोति ॥ ९ ॥
निरास्पदमिति । प्रश्नकुतूहलित्वं निरास्पदम् । त्वदागमनप्रयोजनप्रश्नो निरास्पद इत्यर्थः । 'आस्पदं प्रतिष्ठायाम्' इति निपातः । प्रश्नावकाशे हेतुमाह—निःस्पृहाणाम् । युष्मादृशामित्यर्थः । अस्मास्वधीनमायत्तं किमु । न किञ्चिदस्मत्तो लब्धमित्यर्थः । आधारत्वविवक्षायां सप्तमी । तथाऽपि कल्याणकरीम् । अस्मद्धितैकहेतुमित्यर्थः । निःस्पृहवृत्तेः परार्थ्यादिति भावः । 'कृञो हेतु-' इति टप्रत्यये ङीप् । अतस्ते गिरं श्रोतुमिच्छा माम् । मुखं वागस्यास्तीति मुखरो निरन्तरभाषी । 'रप्रकरणे खमुखकुञ्जेभ्य उपसंख्यानम्' इति रः । 'दुर्मुखे मुखरावद्बमुखौ' इत्यमरः । ततश्चिवप्रत्ययः । मुखरीकरोति । व्याहारयतीत्यर्थः । निःस्पृहस्यापि ते वाक्यमस्मद्धितकरत्वाच्छ्रोतव्यमिति भावः ॥ ९ ॥
अन्वयः—प्रश्नकुतूहलित्वं, निरास्पदम् अस्मासु निःस्पृहाणाम्, अधीनं किमु । तथाऽपि कल्याणकरीं ते गिरं श्रोतुम्, इच्छा, मां मुखरीकरोति ॥ ९ ॥
व्याख्या—प्रश्नकुतूहलित्वम् = भवदागमनप्रयोजनपृच्छौत्सुक्यम् । निरास्पदम् = अनाधारम्, अयुक्तमित्यर्थः । कुत इत्यत आह—अस्मासु = पाण्डवेषु, विषायिष्वित्यर्थः, निःस्पृहाणां = निरीहाणामनिच्छावतामित्यर्थः । अधीनम् = आयत्तं किमु ! न किमप्यस्मभ्यं लभ्यं विद्यते भावादृशां वीतस्पृहाणामत आगमनजिज्ञासा व्यर्थैवेति भावः । तथाऽपि = आगमनहेतुपृच्छौत्सुक्योऽनाश्रयेऽपि, ते = तव, कल्याणरीं = मङ्गलकरीं, गिरं = वाचं, श्रोतुम् = आकर्णयितुम्, इच्छा = अभिलाषा, मां = युधिष्ठिरम्, मुखरीकरोति = वाचालयति, व्याहारयतीत्यर्थः, निःस्पृहस्य ते समागमो न स्वार्थसाधनाय, किन्तु मदर्थसम्पादनायैवातस्तद्विप्रमङ्गलविधायकवचनश्रवणाभिलाषा मां प्रेरयति ॥ ९ ॥
समासः—कुतूहलमस्यास्तीति कुतूहली कुतूहलिनो भावः कुतूहलित्वम् प्रश्नस्य कुतूहलित्वम् , प्रश्नकुतूहलित्वम् , निर्गता स्पृहा येषां ते निःस्पृहास्तेषां निःस्पृहाणाम् ॥ ९ ॥
व्याकरणम्—मुखरीकरोति=मुखर + च्वि + कृ + लट् । श्रोतुम् = श्रु=तुमुन् ॥ ९ ॥
वाच्यान्तरम्—प्रश्नकुतूहलित्वेन निरास्पदेन भूयते । निःस्पृहाणामस्मास्वधीनेन केन भूयते । यथाऽपि कल्याणकरीं ते गिरं श्रोतुमिच्छयाऽहं सुखरीक्रियते ॥ ९ ॥
कोषः—'कौतूहलं कौतुकं च कुतुकं च कुतूहलम्' इत्यमरः । 'श्वःश्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मङ्गलं शुभम्' इत्यमरः । 'ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वाग्वाणी
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् ११
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सरस्वती' इत्यमरः। 'इच्छाऽऽकाङ्क्षा स्पृहेहा तृड् वाञ्छा लिप्सा मनोरथ' इत्य- मरः। 'अधीनो निम्न आयत्तः' इत्यमरः ॥ ९ ॥
सारार्थः—यतो भवादृशां वीतस्पृहाणां कुत्रापि किमपि लब्धुं समागमनं नहि भवति, अतस्तवागमनकारणप्रश्नोऽनुपपन्नोऽस्ति। तथाऽपि कल्याणसाधिकां भव- दीयां वाणीं श्रोतुमिच्छा मां प्रेरयतीति ॥ ९ ॥
भाषार्थः—'आप यहाँ किस लिये आये हैं ? यह पूछना व्यर्थ है। क्योंकि आप जैसे निरीह लोगों को मेरे यहाँ क्या प्रयोजन है। तो भी अपना मङ्गल करनेवाली आपकी बात सुनने की इच्छा मुझे बकवादी बनाती है ॥ ९॥
इत्युक्तवानुक्तिविशेषरम्यं मनः समाधाय जयोपपत्तौ। उदारचेता गिरमित्युदारां द्वैपायनेनाभिदधे नरेन्द्रः॥ १०॥
इतीति ॥ इतीत्थमुक्तिविशेषरम्यमुक्तिवैचित्र्यचारु यथा तथोक्तवान् । उदार- चेता महामना नरेन्द्रो द्वैपायनेन व्यासेन । द्वीपमयनं स्थानं जन्मभूमैर्यस्य स द्वीपायनः स एव द्वैपायनस्तेन । 'प्रज्ञादिभ्यश्च' इति स्वार्थेऽण्प्रत्ययः। नापत्यार्थे । 'नडादिभ्यः फक्' । तेष्वेव पाठाद्वाधितार्थत्वाच्च। जयोपपत्तौ मनः समाधाय । जय- सिद्धिमपेक्ष्येत्यर्थः । इति वक्ष्यमाणप्रकारामुदारामर्थवतीं गिरमभिदधे उक्तः। दुहादित्वादप्रधाने कर्मणि लिट् । 'प्रधानेकर्मण्याख्येये लादीनाहुर्द्विकर्मणाम् । अप्रधाने दुहादीनां ण्यन्ते कर्तुश्च कर्मणः।' इति वचनात् ॥ १० ॥
अन्वयः—इति, उक्तिविशेषरम्यम्, उक्तवान्, उदारचेता, नरेन्द्रः, द्वैपायनेन, जयोपपत्तौ, मनः, समाधाय, इति, उदरां, गिरम्, अभिदधे ॥ १० ॥
व्याख्या—इति = पूर्वोक्तनवश्लोकार्थरूपम्, उक्तिविशेषरम्यं = वचनवैचित्र्यचारु, चमत्कृतिकरवाक्यरचनमित्यर्थः । उक्तवान् = कथितवान्, उदारचेताः = विशाल- हृदयः नरेन्द्रः = राजा युधिष्ठिर इत्यर्थः । द्वैपायनेन = व्यासेन, जयोपपत्तौ = जययुक्तौ, शत्रुपरजयसाधकोपाय इत्यर्थः । मनः = चित्तं, समाधाय = संयोज्य, इति = वक्ष्यमाणाम्, उदाराम् = अर्थबहुलां, गिरं = वाणीम्, अभिदधे = उक्तः ॥ ११ ॥
समासः—उक्तिनां विशेष उक्तिविशेषस्तेनोक्तिविशेषेण रम्यमित्युक्तिविशेषरम्यम् । जयस्योपपक्तिर्जयोपपत्तिस्तस्यां जयोपपत्तौ । उदारं चेतो यस्य स उदारचेताः । द्विर्गता आपो यस्मात्तद्दीपं, द्वीपगयनं यस्य स द्वीपायनः, स एव द्वैपायनस्तेन द्वैपायनेन ॥ १० ॥
व्याकरणम्—उक्तवान् = वच् + क्ववत् । सामाधाय = सम् + आ + धा = क्त्वा + ल्यप् । अभिदधे + अभि + लिट् ॥ १० ॥
१२ किरातार्जुनीयम् [ तृतीयः
वाच्यान्तरम्—इत्युक्तिविशेषरग्यमुक्तवन्तमुदारचेतसं नरेन्द्रं द्वैपायनो जयोप- पत्तौ मनः समाधायेष्युदारां गिरमाभिदधौ ॥ १० ॥
कोषः—'व्याहार उक्तिर्लपितं भाषितं वचनं वच' इत्यमरः। 'ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वाग्वाणी सरस्वती' इत्यमरः ॥ १० ॥
सारार्थः—एवं स्वं प्रति चमत्कारेणोक्तवन्तं युधिष्ठिर प्रति, तथा जयलाभो भवेत्तथा विचार्य तत्सिद्धान्तरूपं वचनं व्यासोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
भाषार्थः—इस तरह बडी ही चमत्कारपूर्ण बात कहते हुए फैले दिल वाले युधिष्ठिर के प्रति, व्यासजी जय होने की युक्ति में दिल लगाकर आने वाली बातें बोले ॥
आदौ तावत्तस्य माध्यस्थ्यभङ्गदोषं युग्मेन परिहरति—
चिचीषतां जन्मवतामलघ्वीं यशोऽवतंसामुभयत्र भूतिम् । अभ्यर्हिता बन्धुषु तुल्यरूपा वृत्तिर्विशेषेण तपोधनानाम् ॥११॥
चिचीपतामिति ॥ अलघ्वीं गुर्वीम् । वोतोगुणवचनात् इति ङीप् । । यशोऽवतंसां कीर्तिभूषगाम् । उभयत्रेह चामुत्र च भूतिं श्रेयश्चिचीषतां चेतुं संग्रहीतुमच्छताम् । चिनीतेः सन्नन्ताच्छतृप्रत्ययः । जन्मवतां शरीरिणां बन्धुषु विषये तुल्यरूपैकविधा वृत्तिर्व्यवहारोऽभ्यर्हितोचिता तपोधनानां स्वस्मत्सदृशां विशेषेण नियमेनाभ्य- र्हिता ॥ ११ ॥
अन्वयः—अलघ्वीं, यशोऽवतंसाम्, उभयत्र, भूति, चिचीषतां, जन्मवता, बन्धुषु, तुल्यरूपा, वृत्तिः, अभ्यर्हिता, तपोधनानां, विशेषेण, तुल्यरूपा ॥ ११ ॥
व्याख्या—अलघ्वीं = महायसीं, यशोऽवतंसां = कीर्तिभूषणाभू, उभयत्र = इह अमुत्र च, भूतिम् = एश्वर्यं, चिचीषतां = सङ्ग्रहीतुमभिलषतां, जन्मवतां = देहव- ताम्, बन्धुषु = स्वजनेषु, तुल्यरूपा=एकरूपा, अभेदरूपेति भावः । वृत्तिः = व्यापारः, वा व्यवहार इत्यर्थः । अभ्यर्हिता = अभ्युचिता, समुचितेति भावः । तपोधनानां = तपस्विनाम्, अस्मत्सदृशामिति शेषः । तु विशेषेन = अधिकतया, निश्चयेनेत्यर्थः तुल्यरूपा वृत्तिरुचितेति भावः ॥ ११ ॥
समासः—चेतुमिच्छन्तश्चिचीषन्तस्तेषां चिचीषताम् । जन्मास्त्येषामिति जन्म- वन्तस्तेषां जन्मवताम् । न लघ्वीत्यलघ्वी तामलघ्वीम् । यश एवावतंसो यस्याः सा यशोऽवतंसा तां यशोऽवतंसाम् । तुल्यं रूपं यस्याः सा तुल्यरूप। । तप एव धनं येषामिति तपोधनानां ॥ ११ ॥
व्याक०—चिचीषतां = चिञ् + सन् + शतृ । अभ्यर्हिता = अभि + अर्ह + तृच् ॥
वाच्यान्तरम्—जन्मवतां बन्धुषु तुल्यरूपया भृत्याऽभ्यर्हितया भूयते ॥ ११ ॥
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १३
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १३
कोशाः—‘प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यशरीरिण’ इत्यमरः। ‘पुंस्युत्तंसावतंसौ द्वौ कर्णपूरेऽपि शेखर’ इत्यमरः। ‘विभूतिर्भूतिरैश्वर्यम्’ इत्यमरः। ‘सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धुस्वजना’ इत्यमरः ॥ ११ ॥
सारार्थः—ये जना इह लोके परलोके च महतीं स्फुरन्तीं यशःपताकां लब्धुमिच्छन्ति, तैः स्वजनेषु निष्पक्षपातो व्यवहारो विधेयः, न हि कदाचित्पक्षपातकार्यः पक्षपाते कृतेऽयशः प्रसरति । तत्र ये किल तपस्विनस्तेषां कथैव का, तैस्त्व नियमेन सर्वत्र समदृष्टिः संरक्ष्या, अन्यथा योगिलक्षणनिपातः स्यादिति ॥ ११ ॥
भाषार्थः—बहुत यशरूप अलङ्करण अर्थात् ऐश्वर्य को जमा करने वाले लोगों को चाहिए कि अपने परिजनों में बराबर व्यवहार रखें। फिर तपस्वियों को तो जरूर समदृष्टि रखनी चाहिए ॥ ११ ॥
तथाऽपि निघ्नं नृप तावकीनः प्रह्वीकृतं मे हृदयं गुणौघैः ।
वीतस्पृहाणामपि मुक्तिभाजां भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः ॥ १२ ॥
तथापीति॥ तथाऽपि तुल्यवृत्तौ चित्तेऽपि । हे नृप ! तावकीनैस्त्वदीयैः । ‘युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्’ इति खञ्प्रत्ययः । ‘तवकममकावेकवचने’ इति तवकादेशः गुणौघैः प्रह्वीकृतमावर्जितं मे हृदयं निघ्नं स्वदायत्तम्’ ‘अधीनो निघ्न आयत्तः’ इत्यमरः। ननु निःस्पृहस्य कोऽयं पक्षपात इत्यत्राह—वीतेति । वीतस्पृहाणां विरक्तानां मुक्तिभाजाम् । मुमुक्षूणामित्यर्थः। भवन्तीति भव्याः साधवः। ‘भव्यगेय-’ इत्यादिना कर्तरि निपातः। तेषु पक्षपाताः स्नेहा भवन्ति । न तु साध्वनुग्रहो महतां माध्यस्थ्यभञ्जक इति भावः ॥ १२ ॥
अन्वयः—तथाऽपि ( हे ) नृप !, तावकीनः, गुणौघैः, प्रह्वीकृतं, मे, हृदयं, निघ्नं, हि, वीतस्पृहाणां, मुक्तिभाजाम्, अपि, भव्येषु, पक्षपाताः, भवन्ति ॥ १२ ॥
व्याख्या—तथापि = समव्यवहारविधानौचित्येऽपि, हे नृपः = हे राजन्, युधिष्ठिर ! इत्यर्थः। तावकीनैः = त्वदीयैः, त्वत्सम्बन्धिभिरित्यर्थः। गुणौघैः=गुणसमूहैः, प्रह्वीकृतम् = आवर्जितम्, मे = मम, व्यासस्येत्यर्थः। हृदयम् = मनः, निघ्नं = त्वदधीनं जातमिति शेषः। हि = यस्माद्धेतोः, वीतस्पृहाणां = निरीहाणां विषयाभिलाषविमुखानामित्यर्थः। मुक्तिभाजाम् = मोक्षाभिलाषिणाम्, अपि समदृष्टिरक्षणोचितानामपि योगिनामित्यर्थः। भव्येषु = सज्जनेषु, पक्षपाताः = स्नेहाः, एकपक्षोपकारकरणाभिलाषा इत्यर्थः। भवन्ति = जायन्ते ॥ १२ ॥
समासः—गुणानामोघा गुणौघास्तैर्गुणौघैः। वीता विगता स्पृहा येषां ते वीतस्पृहास्तेषां वीतस्पृहाणाम्। भक्तिं भजन्त इति भक्तिभाजस्तेषां भक्तिभाजाम्। पक्षे पाताः पक्षपाताः ॥ १२ ॥
१४ किरातार्जुनीयम् [ तृतीयः
व्याकरणम्—भवन्ति = भू + लट् ॥ १२ ॥
वाच्यान्तरम्—तथाऽपि हे नृप ! तावकीनौर्गुणौघैः प्रह्वीकृतेन मे हृदयेन निघ्नेन भूयते । हि वीतस्पृहाणां भक्तिभाजमपि भव्येषु पक्षपातैर्भूयते ॥ १२ ॥
कोषः—‘अधीनो निघ्न आयत्त’ इत्यमरः ॥ १२ ॥
सारार्थः—यद्यपि तपोधनैरस्मत्सदृशैः सर्वत्र समा दृष्टि रक्ष्या, तथाऽपि तव गुणसमूहैर्वशीकृतं मदीयं मनः, यतो निरीहाणामपि दीनभव्येषु पक्षपातो भवत्येवेति ॥ १२ ॥
भाषार्थः—तो भी, हे राजा युधिष्ठिर ! तुम्हारे गुणों से पिघला हुआ मेरा मन तुम्हारे कब्जे में पड़ गया है । क्योंकि वैरागी और मुक्ति चाहनेवालों का भी अनाश्रय भव्य (भले) आदमी में पक्षपात (एकतरफा ख्याल) हो ही जाता है ॥१२॥
अथ नृपस्य गुणवत्तां प्रकटयितुं धृतराष्ट्रस्य दुश्चेष्टामुद्घाटयति—
सुता न यूयं किमु तस्य राज्ञः सुयोधनं वा न गुणैरतीता ।
यस्त्यक्तवान्वः स वृथा वलाद्वा मोहं विधत्ते विषयाभिलाषः ॥१३॥
सुता इति ॥ यूयं तस्य राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सुताः पुत्रा न किमु । अपि तु सुता एवेत्यर्थः । गुणैः शान्तिदानदाक्षिण्यादिभिः सुयोधनं नातीता नातिक्रान्ता वा । अतीता एवेत्यर्थः । कर्तरि क्तः । असुतत्वमगुणत्वं च त्यागे हेतुः । युष्मासु तन्नास्तीत्यर्थः । उपालम्भे कारणमाह—य इति । यो धृतराष्ट्रो वा युष्मान्वृथा निष्कारणमेव त्यक्तवान् । यदि वयं सुता गुणाधिकाश्च तर्हि कथमत्याक्षीत्तत्राह—बलादिति । स विषयाभिलाषः भोगतृष्णा बलाद्वा बलादिव । ‘वा स्याद्विकल्पोपमयोरेवाथेऽपि समुच्चये’ इति विश्वः । मोहमविवेकं विधत्ते । विषयाभिलाषादतिरिक्तं न कश्चिद्युष्मत्यागहेतुरस्तीत्यर्थः । अत्र कार्यकारणसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ १३ ॥
अन्वयः—यूयं, तस्य, राज्ञः, न, किमु, वा, गुणैः सुयोधनं, न अतीताः, यः, वः, वृथा, वा, बलात्, त्यक्तवान्, स, विषयाभिलासः, मोहं, विधत्ते ॥
व्याख्या—यूयम् = भवन्तः, पाण्डवा इत्यर्थः । राज्ञः = भूपतेः, तस्य = धृतराष्ट्रस्य, सुताः = पुत्राः न किमु = किं न भवथ, अपि तु तस्य यूयं पुत्रोपमा एवेति भावः । वा = अथवा, गुणैः = शौर्यादार्यगाम्भीर्यविद्याऽऽदिभिः सुयोधनं = दुर्योधनम्, अतीताः = अतिक्रान्ताः, न ? अपि तु अतीता एव, अर्थात् भवरस्वपि पुत्रेषु सत्सु दुर्योधनश्चेद्गुणवत्तमस्तदा तत्पक्षपातकरणं किञ्चिद् युक्तम् परन्तु तथा न, किन्तु स च दुर्योधनो दुर्गुणैर्भवन्तमतिक्रान्तः, ईदृश्यां स्थितौ यजन्मान्धेन स्वात्मजस्य पक्षपातः ? कृतः स नोचित इत्याशयः । यः = धृतराष्ट्रः, एतन्नामको दुर्योधनपितेति
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १५
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १५
यावत् । वः युष्मान्, पाण्डवानिति भावः । वृथा = अकारणमेव, वा = पक्षान्तरे, बलात् = सहसा, अविचिन्त्यैवेत्यर्थः । त्यक्तवान् = जहौ, सः विषयाभिलापः = रूपादिभोगेच्छाऽऽत्मकः, मोहं = भ्रमं, विधत्ते = करोति । अर्थात् स्वार्थपरता वा भोगाभिलापाऽपि कर्त्तव्यमार्गेऽन्धकाररूपेणागत्य किं न कर्त्तव्यमिति ज्ञाननिश्चयस्यावलोकनप्रथां करोतीत्यर्थः ॥ १३ ॥
समासः—विषयाणामभिलाषो विषयाभिलापः ॥ १३ ॥
व्याकरणम्—त्यक्तवान् = त्यज् + क्तवतु । विधत्ते = वि + धा + लट् ॥ १३ ॥
वाच्यान्तरम्—युष्माभिः किमु तस्य राज्ञः सुतैर्न भूयते । वा युष्माभिः सुयोधनोगुणैर्नातीत: । येन यूयं वृथा त्यक्ताः । विषयाभिलाषेण मोहो विधीयते ॥ १३ ॥
कोषः—'आत्मजस्तनयः सूनुः सुतः पुत्र स्त्रियां त्वमी' इत्यमरः । 'वृथा निरर्थकाविध्योः' इत्यमरः । 'मोहश्चित्तभ्रमो भ्रान्तिर्भ्रमो मूर्छति संमता' इति कोषः ॥
सारार्थः—भवन्तोऽपि धृतराष्ट्रस्य भ्रातृपुत्रत्वेन पुत्रोपमा एव, तत्रापि दुर्योधनापेक्षया विशेषगुणवन्तोऽपि सन्ति, तथापि तेन यद्भवन्तस्त्यक्ताः स्वपुत्रोऽङ्गीकृतस्तन्नोचितं विहितम् । परन्तु विषयाभिलाषो मोहं करोति, तेन हेतुना धृतराष्ट्रस्य मतिर्मोहापन्ना जाता इति ॥ १३ ॥
भाषार्थः—क्या आप पाँचो भाई धृतराष्ट्र के लड़के नहीं हैं या दुर्योधन से विशेष गुणी नहीं हैं, जो उसने आप लोगों को छोड़ दिया सो व्यर्थ ही और बिना विचार से, क्योंकि विषय की चाह मनुष्य को हृदयहीन कर देती है ॥ १३ ॥
अथ राज्ञ उत्साहवर्द्धनाय शत्रोर्हानिं सूचयति—
जहातु नैनं कथमर्थसिद्धिः संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः ।
असाधुयोगा हि जयान्तरायाः प्रमाथिनीनां विपदां पदानि ॥ १४ ॥
जहात्विति ॥ एनं धृतराष्ट्रमर्थसिद्धिः कथं न जहातु । जहात्येवेत्यर्थः । 'प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च' इति प्राप्तकाले लोट् तस्य हानिकालः प्राप्त इत्यर्थः । कुतः । यो धृतराष्ट्रः संशय्य सन्दिह्य कर्णादिषु । तिष्ठते कर्णादीन्दुर्मन्त्रिणः सन्दिग्धार्थनिर्णेतृत्वेनावलम्बत इत्यर्थः । 'प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च' इति स्थेयाख्यायामात्मनेपदम् । तिष्ठतेऽस्मिन्निति स्थेयो विवादपदनिर्णोता । तथा हि । असाधुयोगा दुर्जनसंसर्गा जयान्तराया जयविघातकाः । किञ्च प्रमाथिनीनामुन्मूलनवशीलानां विपदां पदानि स्थानानि । 'पदं व्यवसितत्राणस्थानलक्ष्माङ्घ्रिवस्तुषु' इत्यमरः । न केवलं जयघातिनः किन्त्वनर्थकारिणश्चेत्यर्थः धृतराष्ट्रोऽपि दुर्जनः—विधेयत्वाद् विनंक्ष्यतीति ॥ १४ ॥
अन्वयः—यः, कर्णादिषु, संशय्य, तिष्ठते, एनम्, अर्थसिद्धिः, कथं, न, जहातु, हि, जयान्तरायाः, असाधुयोगाः, प्रमाथिनीनां, विपदां पदानि ( भवन्ति ) ॥
| १६ | किरातार्जुनीयम् | [ तृतीयः |
|---|
व्याख्या—यः = धृतराष्ट्रः, कर्णादिषु = अङ्गराजप्रभृतिषु, संशय्य = संशयमाप्य, तिष्ठते = निर्णये सुखेन व्यवतिष्ठते / सुखेनाववलम्बते, तम्, एनं, कथं = कस्माद्, न = नहि, अर्थसिद्धिः = प्रयोजनसिद्धिः, जहातु = त्यजतु, अवश्यमेव दुर्नयतां कर्णादीनां मन्त्रणया तस्येष्ट-सिद्धिः कथमपि न भविष्यतीति भावः। हि = यस्मात् कारणात्, जयान्तरायाः = जयविघ्नरूपाः, असाधुयोगाः दुर्जनसंसर्गाः, प्रमाथिनीनाम् = उन्मूलनशीलानां, विपदाम् = आपदां, दुःखानामित्यर्थः। पदानि = स्थानानि, भवन्ति ॥ १४ ॥
समासः—अर्थस्य सिद्धिर्अर्थसिद्धिः। कर्णं आदिर्येषां ते कर्णादयस्तेषु कर्णादिषु। न साधुरसाधुः, असाधोर्योगा असाधुयोगाः, जयस्यान्तरायाः जयान्तरायाः ॥ १४ ॥
व्याकरणम्—जहातु = हा + लोट्। संशय्य = सम् + शीङ् + क्त्वा + ल्यप्। तिष्ठते = स्था + लट् ॥ १४ ॥
वाच्यान्तरम्—येन कर्णादिषु संशय्य स्थीयते। सोऽयं कथं नार्थसिद्ध्या हीयतां, हि जयन्तरायैरसाधुयोगैर्विपदां पदैर्भूयते ॥ १४ ॥
कोषः—'कर्णः श्रुतौ, कर्णभूपे, जात्यः यक्ष्ममहाम्बुजे-' इति कोषः। 'विघ्नोऽन्तरायः प्रत्यूह' इत्यमरः। 'पदंव्यवसितत्राणस्थानलक्ष्माङ्घ्रिवस्तुषु' इत्यमरः ॥ १४ ॥
सारार्थः = अहो कर्णदुर्योधनदुःशासनादीनामन्यायमार्गनिरतानां विचारेण यो धृतराष्ट्रः प्रवर्तते। कथं तस्याभ्युदयो भविष्यति। वस्तुतो दुर्जनजनसङ्गतयो जयविघ्नस्वरूपस्तथा चोन्मूलनशीलानां विपत्तीनां स्थानान्येव भवन्ति, अतो नियतं कियता कालेन तस्य विपत्तयः समुत्पत्स्यन्ते ॥ १४ ॥
भाषार्थः—जो कि संदेह होने पर कर्ण आदि अन्याइयों की राय पर चलता है, कैसे उसको कार्यसिद्धि नहीं छोवेगी। क्योंकि जय का विघ्नरूप दुर्जनों का सङ्ग सत्यानाश करनेवाली विपत्तियों की जगह है ॥ १४ ॥
एवं शत्रोरनर्थं सूचयित्वा राज्ञोऽर्थसिद्धिं सूचयति—
पथश्च्युतायां समितौ रिपूणां धर्म्यो दधानेन धुरं चिराय।
त्वया विपत्स्वप्यविपत्तिरम्यमाविष्कृतं प्रेम परं गुणेषु ॥ १५ ॥
पथ इति ॥ रिपूणां समितौ सभायाम्। 'सभासमितिसंसदः' इत्यमरः। पथश्च्युतायां मार्गाद् भ्रष्टायाम्। दुरात्मनो दुःशासनस्य स्त्रीग्रहणसाहसमङ्गीकृतवत्यामित्यर्थः। चिराय धर्म्यां धर्मादनपेताम्। 'धर्मंपथ्यर्थन्यायादनपेते' इति यत्प्रत्ययः। धुरं भारं दधानेन। कृच्छ्रेष्वपि धर्मादचलतेत्यर्थः। त्वया विपत्स्वपि, अविपत्त्या विनाप्यत एव रम्यं गुणेषु शान्तत्यागादिषु विषये परमुत्कृष्टं प्रेमाविष्कृतं प्रकटीकृतम्। दुःसहमपि सोढवता त्वया साधु कृतमिति भावः ॥ १५ ॥
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १७
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् १७
अन्वयः—पथश्च्युतायां, रिपूणां, समितौ, चिराय, धम्म्यां, धुरं, दधानेन, त्वया, विपत्सु, अपि, अविपत्तिरम्यं, गुणेषु, परं, प्रेम, आविष्कृतम् ॥ १५ ॥
व्याख्या—पथश्च्युतायां = न्यायमार्गभ्रष्टायां, रिपूणां = शत्रूणां, दुर्योधनादीनामित्यर्थः । समितौ = सभायां, धम्म्यां = धर्मयुक्तां, धुरं = भारं, दधानेन = बिभ्रता, त्वया = भवता, युधिष्ठिरेणेत्यर्थः । विपत्सु = आपत्सु, दीनदशास्वित्यर्थः । अपि, अविपत्तिरम्यं = सुखावसरवद्रुचिरं, वा, अविपत्ति=अनश्वरं, रम्यं = प्राज्ञ, निष्कपटमित्यर्थः । परं=परमम्, प्रेम = स्नेहः, आविष्कृतम् = प्रकटीकृतम् । सुखावसरे सर्वे गुणेषु प्रेम प्रदर्शयन्ति, परन्तु दुःखावसरेऽपि भवानेव गुणेषु प्रेम प्रदर्शितवान्, अतो भवान् भव्यस्तेन त्वयि पक्षपातो नानुचित इति ॥ १५ ॥
समासः—न विपत्तिर्यत्र तत् अविपत्तिः ॥ १५ ॥
व्याकरणम्—आविष्कृतम् = आविस् = कृ + क्तः ॥ १५ ॥
वाच्यान्तरम्—पथश्च्युतायां रिपुणां समितौ धम्म्यां धुरं दधानस्त्वं विपत्सु, अविपत्तिरम्यं परं प्रेम गुणेषु आविष्कृतवान् ॥ १५ ॥
कोषः—'अयनं वर्त्ममार्गाध्वपन्थानः पदवी सृतिः' इत्यमरः' । 'सभासमितिसंसद' इत्यमरः । 'प्रेमा ना प्रियता हार्द प्रेम स्नेह' इत्यमरः ॥ १५ ॥
भावार्थः—अहो किमधिकं भवतो गुणाधिक्यं वर्णयामि, द्रौपदीवस्त्रापकर्षणसमयेऽप्यन्यायमार्गनिरतानां कौरवाणां सभायां भवान् धर्मं न त्यक्तवान्, तथा चाक्लेशेन गुणेष्वेवादरोऽङ्गीकृतः विपद्दशायां बहवो धर्मवन्तोऽपि किञ्चित् कालपर्यन्तं धर्मं विहायावसरं प्रतीक्षन्ते परं भवाँस्तु तादृश्यामप्यवस्थायां धर्ममेवाङ्गीकृतवान् ॥ १५ ॥
भाषार्थः—नीतिमार्ग से उतरी हुई दुश्मनों की सभा में धर्मयुक्त कार्यभार वहन करते हुए भी तुम्हारे द्वारा विपत्ति में अच्छी हालत के जैसे गुणों में प्रेम दर्शाया गया है ॥ १५ ॥
विधाय विध्वंसमनात्मनीनं शमैकवृत्तेर्भवतश्छलेन।
प्रकाशितत्वन्मतिशीलसाराः कृतोपकारा इव विद्विषस्ते ॥ १६ ॥
विधायेति ॥ किं च शमः पूर्वोक्तः मुख्या वृत्तिर्यस्य तस्यापरोपतापिनी भवतश्छलेन कपटेन । आत्मने हित आत्मनीनः स न भवतीत्यनात्मनीनः । स्वस्यैवानर्थहेतुरित्यर्थः । तम् । 'आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात्खः' इति खप्रत्ययः । विध्वंसमपकारं विधाय कृत्वा । प्रकाशितः प्रख्यापितस्त्वन्मतिशीलयोस्तव प्रज्ञासद्वृत्तयोः सारः प्रकर्षो यैस्ते तथोक्ताः । ते तव विद्विषः कृतोपकारा स्वोपकृतवन्त इव । अपकारोऽप्युपकारायैव संवृत्तः । यदेषां दौर्जन्यं युष्मत्सौजन्यं च जगति सुव्यक्त-
* ३ कि०