भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ७ और दक्षिणाम्नाय स्थितिरूप; पश्चिमाम्नाय संहाररूप है और उत्तराम्नाय अनुग्रहरूप है। दूसरे प्रकार से पूर्वाम्नाय मन्त्रयोग है और दक्षिणाम्नाय भक्तियोग; पश्चिमाम्नाय कर्मयोग है और उत्तराम्नाय ज्ञानयोग है। हे कुलनायिके ! ये सब तत्व ऊर्ध्वा- म्नाय में विद्यमान हैं। साक्षात् ज्ञान-स्वरूप होने से इस आम्नाय में कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता। ऊर्ध्वाम्नाय की यह कुछ महिमा मैंने संक्षेप में यहाँ कही है। अब इसके उत्तम मन्त्र का माहात्म्य कहता हूँ— ऊर्ध्वाम्नाय में 'पराप्रासाद मन्त्र' अधिष्ठित है, जो हम दोनों का परमस्वरूप है। उसे जो जानता है, वह स्वयं शिव हो जाता है। पराप्रासाद मन्त्र का ज्ञाता सर्वकर्मविहीन होते हुए भी सहज ही जिस गति को प्राप्त करता है, उसे कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाता। उसके घर में चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पतरु सदैव विद्यमान रहते हैं। पराप्रासाद का जप करनेवालों की साक्षात् कुबेर सेवा करते हैं। परा- प्रासाद मन्त्र का ज्ञाता जो करता है, जो चाहता है और जो बोलता है, वह सब हे महेशानि ! तप, ध्यान, जप स्वरूप ही होता है। दीक्षापूर्वक क्रमयुक्त जो पराप्रासाद मन्त्र को जानता है, वह 'मैं' ही हूँ, इसमें संदेह नहीं। चाहे ब्राह्मण हो या अन्त्यज, चाहे पवित्र हो या अपवित्र—जो पराप्रासाद का जप करनेवाला है, वह निस्सन्देह मुक्त है। चाहे चलते हुए जपे या बैठे हुए, चाहे जगते हुए जपे या सोते हुए, यह पराप्रासाद मन्त्र हे देवेशि ! कभी निष्फल नहीं होता। प्रचलित सहस्रों मन्त्रों में से प्रत्येक पर्याप्त विलम्ब से केवल एक फल प्रदान करता है। किन्तु हे कुलेशि ! यह मन्त्रराज शीघ्र ही सर्व फलों को प्रदान करता है। यह पराप्रासाद मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। चाहे ज्ञानपूर्वक भजन करे या अज्ञानपूर्वक, यह मन्त्र सदैव

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