भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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८ हिन्दी कुलार्णव अभीष्ट प्रदान करता है। इन्द्र और शची, चन्द्र और रोहिणी, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और सूर्य, लक्ष्मी और नारायण, वाणी और ब्रह्मा, रात्रि और दिन, बिन्दु और नाद, प्रकृति और पुरुष, आधार और आधेय, भोग और मोक्ष, प्राण और अपान, शब्द और अर्थ, विधि और निषेध, सुख और दुःख इत्यादि जितने द्वन्द्व समस्त लोकों में दिखाई या सुनाई देते हैं, वे सब हे कुलेश्वरि ! हम दोनों के ही स्वरूप हैं। पुरुष और स्त्री के समस्त रूप हम दोनों के ही अंशों से उत्पन्न हुए हैं। अतएव यह पराप्रासाद मन्त्र सर्वात्मक है। हे देवि ! यह अरूप, भावना-गम्य, परंब्रह्म, निष्कल, निर्मल, नित्य, निर्गुण, आकाशवत् अनन्त और मनवाणी से परे है। इस पराप्रासाद मन्त्र का अर्थ केवल ध्यान से ही प्रकाशित होता है। इसी से हे देवि ! इस मन्त्र का नाम 'परा- प्रासाद' है। यह परतत्त्व का स्वरूप है, सत्-चित् आनन्द इसके लक्षण हैं, शिव-शक्ति से यह ओत-प्रोत है, भुक्ति और मुक्ति का यह देनेवाला है, सकर्मा होते हुए भी यह निष्कर्म है, सगुण होते हुए भी निर्गुण है—अतएव यह श्री प्रासादपरा मन्त्र सब मन्त्रों का शिरोमणि है। ऐसा मानकर जो इस श्रेष्ठ मन्त्र में निष्ठा रखकर आगमोक्त विधि से क्रमपूजा-सहित इसका (श्री प्रासाद परा मन्त्र का) एक सौ आठ बार जप करता है, वह ब्रह्महत्यादि महापापों से मुक्त हो जाता है। दो सौ बार जो जप करता है, वह सब प्रकार की दशाओं में पूर्व जन्मार्जित समस्त पापराशि से छुटकारा पा जाता है। जो तीन सौ बार जपता है, वह समस्त प्रकार के यज्ञों, दानों, व्रतों और तीर्थों का फल प्राप्त करता है। चार सौ बार जो जप करता है, उसके द्वार पर अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ सदैव प्रस्तुत रहती हैं, धर्मार्थकाममोक्ष उसके हाथ में साक्षात्