भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 84 में से

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:१२ हिन्दी कुलार्णव इसी प्रकार क्रमशः मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद देश में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से न्यास करे । तब उक्त क्रम से क्रमशः ऊर्ध्व, प्राक्, दक्षिण, उदीच्य और पश्चिम मुखों में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से न्यास करे । तदनन्तर 'ह्सां ह्सीं' इत्यादि से षडङ्गन्यास कर 'स्हां स्हीं' इत्यादि से भी षडङ्गन्यास करे । इसके बाद निम्न प्रकार षडङ्ग न्यास करे— ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौं स्हौं सर्वज्ञाय नमः—अंगुष्ठयोः । ,, ,, अमृते तेजोमालिनि नित्यतृप्ताय नमः तर्जन्योः । ,, ,, ब्रह्मशिरसे स्वाहा ज्वलितशिखि- शिखायानादिबोधाय नमः मध्यमयोः । ,, ,, वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय नमः अनामिकयोः । ,, ,, सौं वौं हौं नित्यमलुप्तशक्तये नमः कनिष्ठिकयोः । ,, ,, श्रीं श्लीं पशु हुं फट् नित्यमनन्त- शक्तये नमः करतलयोः । इसी क्रम से हृदयादि षडङ्गों में भी न्यास करे । अब अड़तीस कलाओं का न्यास करे । सब मन्त्रों के पूर्व 'ॐ' लगा ले । यथा— पहले समुष्टि अंगुष्ठ से न्यास करे— ॐ ईशानः सर्वविद्यानां शशिन्यै नमः ऊर्ध्ववक्त्रे । ईश्वरः सर्वभूतानां अङ्गदायै नमः पूर्ववक्त्रे । ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मेष्टदायै नमः दक्षवक्त्रे ।

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